Saturday, November 5, 2011

सिनेमा की जमती जमीन - प्रतिरोध का सिनेमा का तीसरा नैनीताल फिल्म फेस्टिवल

उत्तराखंड की सरोवर और पर्यटन नगरी नैनीताल में इस बार, द ग्रुप जन संस्कृति मंच और युगमंच, नैनीताल की साझी कोशिशों के चलते ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान 30, 31 अक्टूबर और 1 नवम्बर को अपनी निरन्तरता में ‘तीसरा नैनीताल फिल्म फेस्टिवल’ के रूप में सम्पन्न हुआ। अब हमारे बीच नहीं रहे प्रसिद्ध फिल्मकार मणि कौल, क्रांतिकारी नाट्यकर्मी और जन संस्कृति मंच के संस्थापक अध्यक्ष गुरुशरण सिंह तथा प्रसिद्ध टीवी पत्रकार कवि कुबेर दत्त की स्मृति को समर्पित इस बार के आयोजन में उल्लेखनीय यह भी रहा कि फिल्मों के साथ-साथ जन समाज से जुड़े मुद्दों पर शोधपरक व्याख्यान और फिल्म निर्माण की ऐतिहासिक यात्रा (छवि, ध्वनि, पाश्र्व संगीत आदि के संदर्भ में) पर भी जानकारी प्रस्तुत की गयी थी। नैनीताल चूंकि सक्रिय बौधिक संस्कृतिकर्मियों और बड़ी पहचान वाले साहित्यक नामों के लिये भी सुपरिचित है अतः ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अपनी अंर्तवस्तु में भी यहां बेहतर ढंग से स्थापित हो पाया है।

तीसरे फिल्मोत्सव के ब्यौरों में जाने से पूर्व यह बताना आवश्यक है कि ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ एक सांस्कृतिक आंदोलन है जिसके अंतर्गत सृजन की सभी विधायें, कला के सभी रूप और संस्कृति के सभी पक्ष वस्तुगत चिन्तन के धरातल पर देश-दुनिया-समाजों को उन्नत, मुक्त और मानवीय गरिमा प्रदान करने के लिये संघर्षरत है। कोई भी संघर्ष बिना प्रतिरोध के संभव नहीं और कोई भी प्रतिरोध बिना विचार के आगे नहीं बढ़ सकता। आज हम जिस दौर में हैं वह तथाकथित रूप से भूमंडलीकरण और वास्तविक रूप से साम्राजी पूंजी के दानवी तंत्र के शिकंजे में कसा हुआ है। कला सृजन की आधुनिकतम विधा सिनेमा और संचार के संजाल ने जहा कारपोरेट सत्ताओं की शोषण लूट की राजनीति को मजबूत किया है वहीं आमजन समाज को भी एक हथियार के रूप में सिने माध्यम को अनुकूल बनाया है। यह अपनी तरह की बिल्कुल नयी जद्दोजहद है। इसी जदोजहद के चलते सिने माध्यम प्रतिरोध के सिनेमा के केन्द्रीय औजार बन पाये हैं। पिछले एक दशक के भीतर जन संस्कृति मंच ने गोरखपुर शहर को केन्द्र बनाकर पूरे उत्तर भारत के 22-25 छोटे-बड़े शहरों में प्रतिरोध का सिनेमा आयोजन के जरिये प्रतिरोध की राजनीति और प्रतिरोध की संस्कृति को विकसित करने में अग्रगति पायी है। इसी का एक पड़ाव उत्तराखंड का नैनीताल शहर भी है। जहां के आयोजन का ब्यौरा आपके समक्ष है।

पहले दिन यानि उद्घाटन के अवसर पर अध्यक्षता करते हुए सुप्रसिद्ध हिन्दी कवि-पत्रकार मंगलेश डबराल ने अपने वक्तव्य में अर्थपूर्ण विचार व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि आधुनिकतम कला विधा सिनेमा और सबसे प्राचीन विधा कविता में कामन तत्व हैं कि दोनों बिम्बों के माध्यम से सृजित होते हैं और करोड़ों बिम्बों में से एक को चुनकर उसे आकार देना पड़ता है। उद्घाटन में मुख्य अतिथि के रूप में विश्व मोहन बडोला ने फिल्म फेस्टिवल के मकसद को तो सराहा ही और सलाह भी दी कि राज्य के अन्य शहरों में भी अपरिहार्य रूप से इसकी शुरूआत होनी चाहिये। बडोला जी की यह शिकायत थी कि उत्तराखंड सरकार की कोई नीति नहीं है लिहाजा प्रतिरोध का सिनेमा एक सशक्त दबाव बना सकेगा और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संवारने का कार्य भी संभव होगा।

प्रतिरोध का सिनेमा’ का राष्ट्रीय अभियान के संयोजक संजय जोशी और जन संस्कृति मंच के उत्तराखंड संयोजक प्रसिद्ध रंगकर्मी ज़हूर आलम ने शैले हाल में पधारे सभी दर्शकों का स्वागत करने के साथ अभियान के व्यापक उद्देश्यों को सामने रखा। साथ ही एक प्लेटफार्म के रूप में फिल्म फेस्टिवल से जुड़ने के लिये अन्य तमाम समानधर्मी संगठनों, व्यक्तियों को आमंत्रित किया। संजय जोशी ने तकनीकी विकास की प्रबलता और सुविधा को सामाजिक सरोकारों के पक्ष में एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उड़ीसा के युवा चित्रकार प्रणव प्रकाश मोहंती इस बार नैनीताल फिल्मोत्सव से यहां के दर्शकों से परिचित हुए। उनके 30 के आसपास चित्रों की प्रदर्शनी का अलग आकर्षण था। कला इतिहास के स्नातक प्रणव अपनी कला और सोच को बाजारवाद के विरुद्ध खड़ा करने के संकल्प के साथ कला के सत्य को बचाये हुए हैं। फेस्टिवल में लगे उनके चित्र निरीह को ताकत देते लगते हैं। जबकि उनका प्रिय रंग काला है जिसे वह रोशनी के सौदागरों को चुनौती देते लगते हैं। उद्घाटन के अवसर पर फेस्टिवल में दिखायी जाने वाली फिल्म कुन्दन शाह की ‘जाने भी दो यारों’ थी। 1983 में बनी यह फिल्म अपने समय की व्यवस्थागत विडम्बना को हास्य व्यंग के साथ प्रस्तुत करती है। दौर के बदलाव के बावजूद जाने भी दो यारो का सत्य आज अपने सबसे नंगे रूप में मौजूद है।
फेस्टिवल का दूसरा दिन विविध स्तरीय व्याख्यानों, चर्चित लघु फिल्मों और बच्चों के कार्यक्रम समेटने वाला था। रामा मोंटेसरी स्कूल नैनीताल के बच्चों ने लोक गीत और लोकनृत्य की प्रस्तुति दी तो आशुतोष उपाध्याय ने बच्चों को धरती के गर्भ की संरचना, आग, पानी, खनिज आदि को बेहद रोचक व सरल तरीके से समझाया। इसके बाद पंकज अडवानी द्वारा निर्देशित हिन्दी बाल फिल्म ‘सण्डे’ का प्रदर्शन भी किया गया। उल्लेखनीय बात यह है कि शैले हाल में लगभग 500 बच्चों ने भागीदारी की। कुछ बच्चों ने हाल के बाहर बच्चों के लिए विशेष रूप से बनायी गयी गैलरी में अपने हुनर का इस्तेमाल करते हुए रोचक चित्र और रेखांकन बनाए । आयोजन टीम ने छोटे बच्चों को बहुत प्यारी छोटी पतंगें भी भेंटस्वरूप दीं ।
लघु फिल्मों में ‘द स्टोरी आफ स्टफ’, ग्लास, ज़ू, भाल खबर, दुर्गा के शिल्पकार और पाकिस्तान के लाल बेंड के म्यूजिक वीडियो के प्रदर्शन ने दर्शकों को विविध विषयों से जोड़ा। दिखायी गयी सभी लघु फिल्में विश्व और भारतीय फिल्मकारों की थी। उपरोक्त में पाकिस्तान के लाल बैंड को थोड़ा इस प्रकार से दर्ज करने की आवश्यकता है कि इसके कार्यक्रम में पाकिस्तान के तीन बड़े इंकलाबी शायरों-फ़ैज़, हबीब ग़ालिब और अहमद फराज की शायरी को आवाम की धरोहर बना दिया है। निश्चित ही लाल बैंड अपने विचारों से भी जुड़ा है।

दूसरे दिन का अंतिम सत्र तीन अलग-अलग क्षेत्रों पर केन्द्रित व्याख्यानों के कारण महत्वपूर्ण हो गया। प्रभात गंगोला द्वारा प्रस्तुत प्रथम व्याख्यान भारतीय सिनेमा के बैक ग्राउंड स्कोर अर्थात् पाश्र्व ध्वनि संयोजन के विकास पर आधारित था कि कैसे तकनीकी विकास ने सिनेमा के पाश्र्व पक्ष को उन्नत बनाया और उसकी ऐतिहासिक यात्रा किन-किन पड़ावों से गुजरी। दूसरा व्याख्यान उड़ीसा में विकास की त्रासदी पर केन्द्रित था जिसे वहां के सूर्य शंकर दाश ने प्रस्तुत किया। पास्को, वेदांत जैसी कुख्यात कंपनियां किस प्रकार उड़ीसा के नियामगिरी इलाके को बर्बाद करने पर तुली हैं। इसको रिकार्ड करने के लिये कैसे कुछ लोग गुरिल्ला तरीके से अपना काम कर रहे हैं और राज्य, केन्द्र सरकार तथा बहुराष्ट्रीय निगमों के गठजोड़ को बेनकाब कर रहे हैं, श्री दाश अपने व्याख्यान को विडियो क्लिपिंग्स के माध्यम से सामने रखते हैं। राष्ट्रीय मीडिया के तमाम चैनल के लिये यह कोई खबर नहीं है। तीसरा व्याख्यान विकास के ही एक नये माडल उत्तराखंड राज्य में बड़े बांधों द्वारा रचे जा रहे विनाश के कुचक्र पर केन्द्रित था जिसे इंद्रेश मैखुरी ने प्रस्तुत किया। मैखुरी भाकपा (माले) के नेता हैं। उड़ीसा के समानान्तर उत्तराखंड में विकास के नाम पर बड़ी पूंजी का आतंक कायम हो चुका है और यह सच्चाई शीशे की तरह साफ है कि बड़े बांध, जिनकी संख्या 50 से उपर है, लगभग उत्तराखंड की में सारी नदियों के ऊपर बन रहे हैं। एक तरह से यह उत्तराखंड की ग्रामीण जनता के लिये बर्बादी की फरमान हैं। श्री मैखुरी ने तमाम ब्यौरों के रूप में इस दुश्चक्र के सारे बिन्दुओं को सामने रखा।

तीसरे दिन के पहले सत्र की शुरूआत मणि कौल निर्देशित फिल्म ‘दुविधा’ से हुई। ‘दुविधा’ भारत में 60-70 के दशक में समांतर और कला फिल्मों के दौर की क्लासिकल फिल्म थी। राजस्थान की सामंती पृष्ठभूमि में स्त्री की नियति को दर्शाने वाली ‘दुविधा’ को कथारूप देने वाले हैं विजयदान देथा। महिला फिल्मकारों की एक पूरी पीढ़ी आज सिने क्षेत्र में भी सक्रिय हो चुकी है। ‘दुविधा’ के प्रदर्शन के बाद चार महिला फिल्मकारों की फिल्में दिखायी गयी। सब्जी मंडी के हीरे (निलिता वाच्छानी), कमलाबाई (रीना मोहन), सुपरमैन आफ मालेगांव (फै़ज़ा अहमद खान) और व्हेयर हैव यू हिडन माई न्यू किस्रेंट मून ? (इफ़त फातिमा)। इन चारों वृत्त चित्रों में अलग-अलग विषय हैं।


नदियों को विषय बनाकर अपल ने अफ्रीका की जाम्बेजी से लेकर भारत की ब्रह्मपुत्र, गंगा और गोमती की रोमांचक यात्रा और इनकी बदलती स्थितियों पर पूर्व से लेकर आज तक एक नजर डाली बोलकर भी और नदी यात्राओं की फिल्म दिखा कर भी। उन्होंने विशेष रूप से इन नदियों और नदी तटवासियों के बरबाद होने के कारणों पर भी गहरी नजर डाली। उत्तराखंड तो तमाम महत्वपूर्ण नदियों कर उद्गम है और नदियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। तीसरे दिन के व्याख्यान रुपी अंतिम प्रस्तुति सुप्रसिद्ध ब्राडकास्टर के. नन्दकुमार थे जिन्होंने दिल्ली से आकर ब्राडकास्टिंग की दुनिया का कैमरे और अन्य उपकरणों के निरन्तर विकास के क्रम में सजाया और फिल्म के माध्यम से बताया।

फैस्टिवल की अंतिम प्रस्तुति क्रांतिकारी धारा के कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ जी के काव्यपाठ और उन पर बनी फिल्म ‘मैं तुम्हारा कवि हूं’ थी। विद्रोही जी अपनी अनोखी शैली और अद्भुत काव्य क्षमता के कारण लोगों के बीच में पहचाने जाते हैं।

..... मदन चमोली

Saturday, March 26, 2011

छठां फिल्म महोत्सव- दूसरे दिन की झलकियाँ

गोरखपुर नहीं जाने का अफ़सोस मन में मत रखिये. हम आपको छठवें फिल्म उत्सव की झलकियाँ दिखाते रहेंगें. पिछली पोस्ट में आप पहले दिन की झलकी देख चुके हैं. अगले दिनों की भी वीडियो क्लिप आपको दिखाते रहेंगे. आज पेश है दूसरे दिन की झलक-

Thursday, March 24, 2011

कुछ और फिल्मों के बारे में

सिटी आफ फोटोज़
निर्देशक- निशिता जैन

सिटी आफ फोटोज़ भारतीय शहरों में पास-पड़ोस के सामान्य से, बहुत कम ध्यान जाने वाले फोटो स्टूडियों के बारे में बात करती है। उन छोटी-सी जगहों के सम्पूर्ण कल्पित संसार की खोज करती है। छोटे-छोटे, टूटे-फूटे ये स्टूडियो जो एक समय में ठुंसे-ठुंसे अटके हुए से दिखते हैं, वही ऊर्जा से लबालब जगहों में तब्दील हो जाते हैं। यहां आने वाले लोगों की तरह ही ये स्टूडियो आश्चर्यों से भरे हुए होते हैं। यहां अपनी पृष्ठभूमि के बरक्स पोज़ देकर और मनपसंद वस्तुओं के साथ फोटो खिंचवाकर लोग खुश हो लेते हैं। ये लोगों की कल्पनाओं और लोकप्रिय रूचियों की दिलचस्प झलक देते हैं।

हालांकि इन मजे और खेलों के नीचे आने वाले दुःख की एक छाया चलती रहती है। सबको फोटो खिंचवाने का चाव नहीं रहता और न ही प्रत्येक पृष्ठभूमि खूबसूरत ही होती है। ये सारी फोटो खुशी के मौके पर ही खींची गईं नहीं होतीं। वे शहर जिनमें ये कहानियां खुलती हैं, स्वयं में पृष्ठभूमि होते हैं, उनकी पथरीली शहरी सच्चाई फोटो में नज़र आने वाली जगहों का पूरक बनाती हैं। इच्छाएं, स्मृतियां और कहानियां ये सभी फोटोग्राफी के अनुभवों से इतने गहरे रूप में जुड़ी हैं कि ‘सिटी आफ फोटोज़’ में वे व्यक्तिगत यात्रा के बतौर आती हैं।


सबद निरंतर

निर्देशक - राजुला शाह

सबद निरंतर, शब्द के भीतर शब्द की खोज है; यह सत्य के आकारहीन सार पर सधा हुआ प्रतिबिम्ब है जो जीवंत अनुगूंज, दुनिया के बारे में अलग-अलग समझदारियों का लगातार और नियत आदान-प्रदान, देशज स्वभाव के काल विशेष और उनकी भावनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त की गई है और इसकी अमर प्रतिध्वनि उभरते हुए आधुनिक जीवन को जीवनी प्रदान करती रहती है।

यह फिल्म भक्ति आंदोलन को विस्तारपूर्वक समझना चाहती है। भक्ति आंदोलन 12वीं सदी के भारत के सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक इतिहास के लिहाज से महत्वपूर्ण पन्ना है। इस समय में मध्यकालीन गूढ़ भक्त कवि जैसे-कबीर, गोरखनाथ, भक्त कवि मीरा, सहजोबाई और दूसरे कई धरती के अभागे इस दुखी धरती पर फले-फूले और इतिहास द्वारा तहस-नहस की गई इस प्राचीन भूमि पर, सामाजिक और दार्शनिक टूट-फूट के पार, एक सशक्त संवाद स्थापित करने के लिए आगे आए। एक प्रवाह के साथ अपनी यात्रा का आरम्भ करते हुए यह फिल्म युगचेतन आदिम स्वरों के भीतर सवालों की खोज करती है और उन रूढ़िवादी, पक्षपाती अंधे मापदंडों को नष्ट करती है, जिनसे ज्ञान, भूत और वर्तमान को मापने की कोशिश करता है।


मेरा अपना शहर
निर्देशक - समीरा जैन

दिल्ली, एक शहर जो देश की राजधानी है, उस शहर में अनुभव लिंगाधारित शहरी माहौल का - जहां आपकी नजर, आवाज और शरीर पर हर पल पहरा रहता है। क्या हो जब चारों ओर लगा यह पहरा की खुद अपनी तरफ ही घूम जाए और रोज ब रोज की एक जांच करे।

फिल्म सवाल खड़े करती है कि क्या शहर के साथ किसी तरह के करीबीपन का, अधिकार का, कहीं, कोई एहसास है? क्या इस शहर में एक महिला, जो लगातार परेशानियों और सुकून के दो विपरीत ध्रुवों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश करती रहती है- आजाद हो सकती है?



मोरलिटी टीवी और लविंग जेहाद
निर्देशक- पारोमिता वोहरा

2005 की सर्दियों में भारतीयों ने एक और ब्रेकिंग न्यूज देखने के लिए अपने टी.वी. आन किए, पर एक खबर ने उन्हें चौंका दिया। मेरठ शहर में पुलिस अफसरों ने, जिनमें से अधिकांश महिला पुलिस अधिकारी थीं, एक पार्क में प्रेमी युगलों पर हमला बोला और उनकी पिटाई कर दी। वे अपने साथ फोटोग्राफरों और समाचार चैनलों के कैमरामैन को भी इस वायदे के साथ ले गई थीं कि उन्हें एक एक्सक्लूसिव स्टिंग आपरेशन भी मिलेगा।

इस न्यूज स्टोरी के पीछे की कहानी क्या है़ ? यह फिल्म फ्रेम के बाहर झांकने की कोशिश करती है जहां भारतीय समाचार चैनलों पर एक शहर के जटिल गतिविज्ञान को सामने लाने के लिए ब्रेकिंग न्यूज की अतिउत्तेजित कसीदाकारी चल रही है- शहर का जटिल गतिविज्ञान जिसमें प्रेम का भय, महिला की गतिशीलता और उसकी यौनिकता की लगातार जांच और उस पर नियंत्रण, सांप्रदायिक हिंसा का इतिहास, पाश्विक जातियता और सामंती गणित आदि शामिल हैं। सस्ती पत्रिकाओं के धृष्ट लहजों और सनसनीखेज पत्रकारिता के लक्षणों का इस्तेमाल करके इस तरह की कथा कहने की परम्परा की पड़ताल की गई है। यह फिल्म मनोहर कहानियां जैसी मसालेदार सच्ची अपराध पत्रिका से लेकर दोहरी नैतिकता वाली सस्ती पत्रिकाओं और भारतीय टीवी की सनसनीखेज पत्रकारिता तक की इनकी अपनी रोमांचक लेकिन तकलीफदेह कथा को खोलती है।

आज की तारीख में जबकि अश्लील हो चुका मीडिया पहले से कहीं ज्यादा नृशंस तरीकों से होने वाली हिंसात्मक घटनाओं के पीछे पागल हो रहा है तो फिल्म की कथा और ज्यादा प्रासंगिक हो उठती है।


पी.ओ. बॉक्स 418, सियासत कानपुर
निर्देशक- साजिया इल्मी

ये फिल्म एक निगाह है उर्दू जबान पर जो हमारी नजर के सामने ही अपने वजूद से फना हो रही है। उर्दू का एक जमाना था। शुमाली हिन्दुस्तान में तालीम और रौशन मुस्तकबिल का जरिया थी उर्दू। अब सिर्फ जिक्र ही रह गया है, उस जबान का जो कभी इल्मी व अदबी जबान थी, अवामी इजहार और शायराना अंदाज की जबान थी, एक आला तहजीब की जबान थी।

शुमाली हिन्दुस्तान के शहरों व कस्बात, स्‍कूल और घरों से इस रस्मलुखत़ का नामोनि‍शान ही रूहपोश होता जा रहा है। शुक्र है हिन्दी फिल्मों के दिलफरेब गानों और डायॅलाग का जिससे उर्दू जब़ान की इन्फरादियत व मकबूलि‍यत बाकी़ है, शुक्र है उन शायरों के खूबसूरत कलाम और उनकी तहरीरों का जिससे उर्दू जबान का मेयार बरकरार है और का़बिले जिक्र हैं वो उर्दू अखब़ारात जो एक तवील अर्से से उर्दू पढने वालों और कौमी खिदमात में उर्दू का रस्मलुखत़ जिंदा रखे हुए है।

तारीख़ का मुसलसल तब्सरा है एक रोजनामा। रोजनामा अपने दौर की नफसियात और सियासत का आईना है। इस फिल्म में ऐसे ही एक रोजनामा सियासत जदीद और इस अखबार से मुन्सलिक मुलाजमीन, ख़ानदानी अफराद और उसके अतराफ उर्दू बोलने वाले लोगों के जरिये उर्दू जबां से मुताल्लिक तासुरात को दिखाने की कोशिश की गई है।

1950 और 1985 के दर्मियान कानपुर से शाया होकर सियासत जदीद वह उर्दू अखबार है जो हर सुबह, मुसलसल, 200 से ज्यादा शहरों और कस्बात में अपने काराईन के पेशे नजर उनको हालाते हाजरा से वाकिफ करता रहा था। 1947 के बाद आजाद हिन्दुस्तान के नए जम्हूरी इंतेजाम में ये अख़बार अक्लि‍यतों के दिलो जहन का एक मुखलिस तर्जुमान था।

सियासत जदीद के बानी, मोहम्मद इसहाक इल्मी (विसाल 1992) दारुल उलूम देवबंद से फारिग आलिम थे और तिब्बिया कालेज, अलीगढ़ से सनदयाफ्ता यूनानी तिब्ब के ग्रेजुएट भी थे। सियायत जदीद के पब्लिशर के इस मुजाहिदाना किरदार से उनको मुस्लिम कौम का ऐतबार और उनकी कयादत का ऐजाज हासिल हुआ।

इस अखबार की मकबूलियत और खुद, अपनी जाती शख्सियत और तमाम जिन्दगी को मौलाना मोहम्मद इसहाक इल्मी ने अक्लि‍यतों और उनके जम्हूरी हुकूक की तहरीक में वक्फ कर दिया। सियासत जदीद आज भी इस लाजवाल जम्हूरियत की तहरीक के रास्ते पर गामजन है।


दायें या बाएं
निर्देशकः बेला नेगी

नब्बे का दशक खतम खतम होते होते सिनेमा के कारोबार में काफी तब्दीलियाँ आयीं. नए बनते मध्यवर्ग को लुभाने के लिए शौपिंग माल और मल्टीप्लेक्सों का जाल बुना जाने लगा. कारोबारियों को इससे जो फायदा हुआ वह तो एक अलग कहानी है लेकिन नए पढ़े लिखे सिनेकारों को भी कुछ करने का मौका मिला. विशाल भारद्वाज, नागेश कुकूनूर, श्रीराम राघवन, अनुराग कश्यप, आशुतोष गौवरीकर, शिमित अमीन, दिबाकर बनर्जी इसी नए व्यापार की उपज हैं. खोसला का घोसला, स्वदेश, भेजा फ्राई, मनोरमा सिक्स फीट अंडर ने बेजान हो चले मुंबई सिनेमा उद्योग में एक नयी जान फूंकी. ऐसे ही समय में पूना के फिल्म इंस्टिट्यूट से फिल्म सम्पादन में प्रशिक्षित एकदम नयी फिल्मकार बेला नेगी ने अपनी पहली फिल्म दायें या बाएं से ढेर सारी उमीदें जगाईं हैं. फिल्म इंस्टिट्यूट से निकलने के बाद बेला ने फिल्म सम्पादन की मशहूर उस्ताद रेनू सलूजा से एडिटिंग के गुर सीखे, फिर हिंदी फीचर फिल्म गाडमदर में बतौर सहायक संपादक काम भी किया.

दायें या बाएं की कहानी फिल्मकार के दिमाग में अखबार में पढ़ी एक खबर से उपजी. खबर यह थी कि असम के गाव में एक आदमी की लाटरी निकलती है फिर उसकी दुनिया में भारी नाटकीय बदलाव आते हैं. बेला ने भी इस खबर को अपने कुमाऊनी परिवेश में ढाला और मुंबई के सिनेमा में एक नई राह बनायी है. लाटरी की दुनिया से हुए उलटफेर की एक कहानी हम कुछ समय पहले एक और फीचर फिल्म मालामाल वीकली में देख चुके हैं. तमाम लटको- झटकों और नामी गिरामी कलाकारों के बावजूद मालामाल वीकली हमें दिमागी तौर पर समृद्ध नही कर पाती जबकि बेला की फिल्म कुछ सोचने पर मजबूर करती है. इससे पहले कि हम दायें या बाएं के अच्छे बुरे पर बात करें हमें फिल्म के कथानक से रूबरू होना जरुरी है.

दायें या बाएं उत्तराखंड के पहाडी समाज की कथा है जिसका नायक रमेश माजीला (दीपक डाबरियाल) मुंबई की भागमभाग वाली दुनिया से ऊबकर वापिस अपने पहाडी परिवेश में सुकून और ईमानदारी का जीवन जीना चाहता है. रमेश के घर में उसकी माँ, बीवी, साली और छोटा बेटा बौजू हैं. घर की छत पर डिश टी वी का एंटिना लग चुका है और इसके जरिये बाजार की दुनिया रमेश के घर में भी प्रवेश कर चुकी है. गाँव में सब कुछ रुका हुआ है, पहाडीपन प्रकृति और जीवन में तेजी से खतम हो रहा है. गाँव का हर लड़का किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद में दिन काट रहा है और रमेश का इस तरह वापिस आना उन्हें गले नहीं उतरता. आदर्शवादी तरीके से रोमानी तबियत का रमेश अपने काम की शुरुआत गाँव के स्कूल में अध्यापन से करता है जहाँ उसके नवाचार को पुराने लोग एक नए पागलपन के बतौर स्वीकार सिर्फ मजाक ही बनाते हैं. गाँव में सिर्फ एक बसंत है जो रमेश को किसी लायक समझता है और उसी की तरह एक दिन वह भी मुंबई में बतौर लेखक अपनी किस्मत चमकाना चाहता है. किसी तरह घिसट रहे समय में एक दिन चमत्कार होता है और बसंत द्वारा टी वी कंपनी को भेजी गयी रमेश की कविता गाँव में एक बड़ी लाल गाड़ी ले आती है और रमेश को गाँव का स्टार बना देती है. लाल गाड़ी रमेश के साथ - साथ पूरे गाँव के लिए लालच और आशा की वाहक बनती है. इसी लाल गाड़ी में बैठकर औरते घास काटने जाना चाहती हैं तो धूर्त नेता मुख्यमंत्री से मिलना चाहता, रमेश का परिवार मैदान में रह रहे अपने रिश्तेदारों पर रौब गांठना चाहता है या फिर एक प्रेमी अपनी प्रेमिका को इसमें ही बिठा कर गाँव से फुर्र होने की कोशिश करता है..

रमेश का लाटरी का निकलना अब किसी सत्य की तरह हर किसी के लिए एक अनिवार्य कर्म बन जाता है जिसकी परिणिति स्कूल की एसेम्बली में एक छात्र को सम्मानित करने से होती है जिसे एक टी वी प्रतियोगिता में प्रेशर कुकर ईनाम में मिला है. एक नएपन के साथ बेला इस लाल गाड़ी को एक पहाडी की चोटी पर अटका देती हैं क्योंकि रमेश को चोटी पर फंसे अपने बछड़े से ज्यादा बचाने कि भूमिका इस गाड़ी में दिखाई नही देती.

फिल्म के आखिरी दृश्य में बछड़े को बचाने के क्रम में लाल गाड़ी का चोटी पर अटक जाना और फिर उसको पहाड़ के जीवन में अमहत्वपूर्ण बना देना ही बेला को बड़ा फिल्मकार बना देता है। फिर हंसी मजाक जैसी हल्की फुल्की लगने वाली फिल्म यकायक एक बड़े जीवन सत्य के पक्ष में खड़ी दिखाई देती. लेकिन क्या यह अंत अचानक किसी फिल्म को हासिल हो सकता है जिसकी कहानी की मुख्य धुरी ही एक चमत्कार हो. यह सब इसलिए संभव हो पाता है क्योंकि निर्देशिका अपने पहले फ्रेम से ही साबित करती है कि फिल्म पूरी की पूरी यथार्थ की जमीन पर है. अब इसके लिए वह सावधानी के साथ एक- एक बात का ध्यान रखना शुरू करती है. मसलन फिल्म की लोकेशन और वेशभूषा को ही लें. तमाम मुश्किलों को उठाकर फिल्म उत्तराखंड के ही इलाके में फिल्माई जाती है, फिर लोकेशन को तर्कसंगत साबित करने के लिए वही के स्थानीय कलाकारों का चुनाव. पूरी फिल्म में 95 फीसदी से ज्यादा पात्र ठेठ कुमायूं के हैं इसलिए मुंबई की आम फिल्म की तरह संवाद आने पर आप चैंकते नहीं बल्कि पहाडी चेहरों और वहां की बोलीके साथ लोकेशन के तादात्म्य को समझने की कोशिश करते हैं. बेला को जहाँ भी मौका लगा स्थानीय रंगत को इस्तेमाल करने का मौका उन्होंने छोड़ा नहीं. फिल्म की शुरुआत में रमेश को घेरे हुए बैठी गाँव की महिलाओं या गाँव की शादी का दृश्य हमें धीरे से उस जीवन के अंतरतम तक प्रवेश करा देता है. स्थानीयता को पकड़ने के क्रम में ही यह फिल्म इसीलिए हर महीने थोक की दर से बनने वाली स्थानीय फिल्मों से ज्यादा वहां की होती है क्योंकि सिर्फ लोकेशन और स्थानीय कलाकार का होना भी किसी प्रकार की विश्वसनीयता गारंटी नहीं देता है.

सवाल है कि आपके पास उस समाज को समझने की कोई अंतर्दृष्टि है की नहीं. कैमरा भी इसी चिंता के तहत वाइड शाटों का निरंतर इस्तेमाल करता है. फिल्म के सम्पादन की लय भी पहाड़ की के जीवन की गति के अनुरूप ही है. रमेश माजीला की त्रासदी के साथ -साथ फिल्म खूबसूरती के साथ स्थानीय पर्यावरण और पलायन के मुद्दे को भी जोड़ पाती है . इस बुनावट के साथ जब आखिरी दृश्य में रमेश निर्लिप्तता के साथ लाल गाड़ी को चोटी पर अटका हुआ देखता है तो यह अंत हमें किसी अनहोनी जैसा नही बल्कि कथानक के स्वाभाविक अंत जैसा प्रतीत होता है. यह स्वाभाविक प्रतीति ही इस फिल्म की उपलब्धि है जो बेला को बड़े फिल्मकारों की साफ में साथ खड़ा करने में कामयाब होगी और पहली बार उत्तराखंड के पहाड़ को सही तरीके से समझने का माध्यम बनेगी.

छठें फेस्टिवल के पहले दिन की झलकियाँ

ऑफसाइड के साथ छठें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल का आगाज

आधी दुनिया के संघर्षो को समर्पित छठें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल का शुभारंभ रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बीच बुधवार को हुआ। फेस्टिवल का उद्घाटन प्रसिद्ध इतिहासकार और नारीवादी चिंतक प्रो.उमा चक्रवर्ती ने किया। उन्होंने कहा कि महिला आंदोलनों को प्रतिरोधी संस्कृति कर्म को ताकतवर बनाना होगा। जुल्म के एकजुट प्रतिरोध से ही न्यायपूर्ण समाज बनेगा।गोरखपुर फिल्म सोसाइटी और जन संस्कृति मंच के इस आयोजन का शुभारंभ सिविल लाइन्स स्थित गोकुल अतिथि गृह के सभागार में लेखक व पत्रकार स्व.अनिल सिन्हा को श्रद्धांजलि से शुरू हुआ। इस अवसर पर स्व.सिन्हा की पत्‍‌नी आशा सिन्हा का संदेश पढ़ा गया। स्व. सिन्हा की एक कविता पर आधारित पोस्टर का लोकार्पण भी हुआ। आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रो.रामकृष्ण मणि ने अतिथियों और दर्शकों का स्वागत करते हुए कहा कि हमारे फिल्म आंदोलन का मकसद नागरिकों की संवेदना और सामाजिक सरोकार को जागृत करना है।

अपने लम्बे उद्घाटन वक्तव्य में प्रो.उमा चक्रवर्ती ने कहा कि स्त्री का संघर्ष सिर्फ भौतिक जरूरतों के लिए ही नहीं बल्कि सोचने, अनुभव करने और अपने आत्म को हासिल करने का भी संघर्ष है। पितृसत्ता के मौजूदा ढांचे को उतार फेंके बिना स्त्री की आजादी संभव नहीं है। उन्होंने 19 वीं सदी के समाज सुधार आंदोलनों को स्त्री केन्द्रित बताया। पर उनके मुताबिक यह मध्यवर्गीय परिवारों के दायरे में सीमित था। इस अवसर पर प्रो.चक्रवर्ती ने फेस्टिवल की स्मारिका का लोकार्पण भी किया। इसके बाद उन्होंने स्त्री अधिकार आंदोलनों और लोकतांत्रिक आंदोलनों से संबंधित अपने निजी संग्रह में मौजूद पोस्टरों पर व्याख्यान दिया। फेस्टिवल की ओर से चित्रकार अशोक भौमिक ने स्मृति चिह्न देकर उन्हें सम्मानित भी किया। उद्घाटन सत्र का संचालन दिल्ली विश्वविद्यालय के उपाचार्य और जसम के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य आशुतोष कुमार ने किया। कार्यक्रम के अंतिम चरण में ईरानी फिल्मकार जफर पनाही की फिल्म आफसाइड का प्रदर्शन किया गया.

उभरा आधी दुनिया का दर्द
फिल्म फेस्टिवल के हर आयाम में आधी दुनिया का दर्द उभरकर सामने आया। फिल्म 'ऑफसाइड' ने स्त्री विरोधी व्यवस्था पर सवाल उठाया। ईरान में महिलाओं को मैदान में जाकर फुटबाल का खेल देखने की इजाजत नहीं है। फिल्म की कहानी में कुछ लड़कियां अपनी पहचान छिपाकर फुटबाल का मैच देखने की कोशिश करती हैं तो उन्हें बैरक में बंद कर दिया जाता है। यह फिल्म इन्हीं कैदी लड़कियों व सिपाहियों के बीच संवादों के जरिए आगे बढ़ती है और स्त्री की आजादी विरोधी व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है।

गीत गवनई, पोस्टर प्रदर्शनी
पटना की 'हिरावल' व बलिया 'संकल्प' सांस्कृतिक संस्थाओं ने फैज गोरख पाण्डेय व विजयेन्द्र अनिल रचनाओं को गाकर सुनाया। सभागार के बाहर युवा चित्रकार अनुपम राय और वरिष्ठ चित्रकार बी. मोहन नेगी के चित्र व कविता पोस्टर भी अपनी जुबान में बहुत कुछ कह रहे थे। इसके अलावा लेनिन पुस्तक केन्द्र व गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल ने महत्वपूर्ण वैचारिक पुस्तकों व पत्रिकाओं की प्रदर्शनी लगायी है।

फेस्टिवल में आज
गुरुवार को देश के आठ राज्यों से फिल्म सोसाइटियों का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित है। शाम के सत्र की कवि बल्ली सिंह चीमा के काव्य पाठ से शुरूआत होगी। संकल्प द्वारा विदेशिया का गायन, नया मीडिया पर परिसंवाद तथा अनिल सिन्हा व्याख्यानमाला की पहली कड़ी के रूप में चित्त प्रसाद की पेंटिंग पर अशोक भौमिक का व्याख्यान होगा। कार्यक्रम के अंत में श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म 'भूमिका' का प्रदर्शन होगा।

Wednesday, March 23, 2011

छठें गोरखपुर फ़िल्मोत्सव में दिखाई जाने वाली कुछ फिल्मों की के बारे में


द अदर सांग
निर्देशक - वसुधा जोशी

मुन्नी शीला की बदनामी और जवानी पर उछलकूद करने वाले इस दौर में यह फिल्म एक ठुमरी के ऐसे पाठ की खोज कर रही है जो स्त्री के काम की अभिव्यक्ति का सूक्ष्म और स्थूल दोनो पक्षों का पाठभेद है। ‘फुल गेन्दवा न मारो लगत करेजवा में चोट’ - इस बनारस अंग की भैरवी ठुमरी का एक पाठ रसूलन बाई ने 1935 में ध्वन्यंकित किया था जो इस प्रकार है - ‘फुल गेन्दवा न मारो लगत जोबनवा में चोट’। करेजवा मूल पाठ है कि जोबनवा और प्रसिद्ध ठुमरी गायिका रसूलन बाई ने करेजवा की जगह जोबनवा क्यों गाया?

इस सूत्र को लेकर सबा दीवान जों इस फिल्म की निर्देशिका है ठुमरी जगत की यात्रा करती है। पर्त दर पर्त खुलती जाती हैं और दर्शक एक ऐसे स्त्री कलाकार समूह के अंतरंग और बहिरंग जीवन से रूबरू होते हैं जिनको समाज के नैतिक ठेकेदारों ने सम्मान जनक जीवन जीने से भी वंचित कर दिया। ये कलाकार रईसों की महफिलों की रौनक थीं आज गुमसुम जीवन बिताने पर मजबूर हैं। रसूलन बाई अपने समय की श्रेष्ठ ठुमरी गायिका रही हैं लेकिन भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान दलितों का उद्धार करने वाले भारत के राष्ट्रपिता गांधी जी ने इन दलित स्त्रियों के आन्दोलन से जुडने के प्रस्ताव को भी यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि वे नैतिकता विहीन हैं और उनका धन और श्रम चोरी का है क्योंकि उन्होंने नैतिकता की चोरी की है। नियति की विडंबना यह है कि रसूलन बाई को अन्ततः महात्मा गांधी के नगर अहमदाबाद ले जाती है जहां उनकी खोई शोहरत उन्हें पुनः प्राप्त होती है।

फिर हिन्दू-मुस्लिम दंगों से प्रताडित होकर वे इलाहाबाद पहुंचतीं है और आकाशवाणी केन्द्र के रास्ते पर छोटी सी दुकान लगाकर अपनी जीवन की संध्या समय व्यतीत करती हैं। रसूलन और उन जैसे अनेक कलाकारों की सामाजिक आर्थिक कलात्मक जीवन के अनेक पहलुओं पर प्रकाश डालती है यह फिल्म - द अदर सांग। स्त्री विमर्श से सरोकार रखने वाले हर संवेदनशील व्यक्ति को यह फिम जरूर देखनी चाहिए.

द एडवोकेट
निर्देशकर- दीपा धनराज

भारत में मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों की स्थापना करने वालों में के जी कन्नावीरन अगुवा थे. एक व्यक्ति की जीवनी और हमारे समय के इतिहास के धागों से बुनी यह फिल्म भारतीय राज्य को शासन, न्याय और राजनैतिक कार्यवाहियों में कानून का राज लागू करने के लिए चुनौती देने वाले कन्नावीरन के अविस्मरणीय योगदान को रेखांकित करती है.

1978 से 1994 तक आन्ध्र प्रदेश सिविल लिबर्टीज कमेटी के अध्यक्ष रहते हुए कन्नावीरन ने इसके कामों को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलवाई. कंसर्नड सिटिजन कमेटी की स्थापना करने वालों में से एक कन्नावीरन ने आन्ध्र प्रदेश सरकार और माओवादी पीपुल्स वार ग्रुप के बीच शान्ति वार्ता में मध्यस्थता की. १९९४ में वे पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद के लिए चुने गए जिसका निर्वाह उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक किया.

मैं तुम्हारा कवि हूँ
निर्देशक- नितिन के.

इस फिल्म को कविता पर भी होना था और कवि पर भी किन्तु यह एक ऐसे व्यक्ति की कथा बन जाती है जो कविता में रहता है।
हम व्यक्ति को समझने की कोशिश करते हैं तो कविता दिखने लगती है और कविता में व्यक्ति सामने आ खड़ा होता है। अंततः जब धीरे-धीरे दोनों के विषय में कुछ पता चलता है तो आपके सामने एक आइना होता है। आइने में एक खुरदुरे जीवन के भीतर पलता मासूम-सा निर्दोष स्वप्न झांकने लगता है। कविता रास्ता दिखाने लगती है और रास्ता धीरे-धीरे कविता में बदल जाता है।

विद्रोही अपने बारे में फैली किंवदंतियों के बीच पिछले दो दशकों से भी ज्यादा से जेएनयू के नागरिक हैं। उनकी ज़रूरतें बेहद कम हैं और चाय-पानी, नशा-पत्ती का खयाल उनके चाहने वाले रख ही लेते हैं। छत जे.एन.यू में कहीं भी मिल जाती है। विद्रोही ने कविता कभी लिखी नहीं, वे आज भी कविता कहते हैं। उनके सोचने का तरीका ही कविता का तरीका है। कविता में वे बतियाते हैं, रोते और गाते हैं; खुद को और सबको संबोधित करते हैं; चिंतन करते हैं, भाषण देते हैं, बौराते हैं, गरियाते हैं, संकल्प लेते हैं। विद्रोही हमारे अवंचित राष्ट्र के कवि हैं, उन लोगों के कवि जिन्हें अभी राष्ट्र बनना है।

गाडेसेज : तीन औरतें
निर्देशक- लीना मणिमेक्कलइ

भारतीय डाक्यूमेंट्री गाडेसेज पिछले वर्षों में दिखाई देने वाली बेहतरीन डाक्यूमेंट्री फिल्मों में एक है. निर्देशक लीना मणिमेकलै पेशे से इंजीनियर होने के बावजूद मीडिया में काम-काज का तजुर्बा रखती हैं और वे डिजिटल फिल्म निर्माण, उत्पादन और सम्पादन के रचनात्मक पहलुओं को बखूबी समझती हैं.

लीना की गाडेसेज कोई साधारण फिल्म नहीं है. एच डी पर 2007 में बनाई गयी यह फिल्म 42 मिनट की है. आपको झकझोरने और आपकी दिलचस्पी बनाए रखने से आगे यह फिल्म आपको बताती है कि आजीविका का लिए न्यूनतम संसाधनों में रहते हुए भी भारत की स्त्रियाँ और क्या हासिल कर सकती हैं. गाडेसेज शुरुआत से ही अपने अनोखे चरित्रों की वजह से दर्शक को अपनी पकड़ में ले लेती है. भड़कीली और मैली कुचैली साडि़यों में लिपटी फिल्म की नायिकाएं वृद्ध हैं, कुरूप हैं, मैली-कुचैली और मोटी-झोटी हैं. ये ऐसी महिलायें हैं जिन्हें आप देखना पसंद नहीं करते- आइये फिल्म के जरिये ही इनसे एक अच्छी मुलाकात करते हैं.

लीना या किसी और को इन महिलाओं पर फिल्म क्यों बनानी चाहिए! जवाब यह कि परदे पर ये महिलायें बेहद दिलचस्प चरित्र दीखती हैं. तामिलनाडु के निचले वर्गों से आने वाली इन अकेली और बहादुर महिलाओं को इसकी कोई परवाह नहीं. वे सिर्फ पेट भरने भर का कमा पाती हैं पर उस कम कमाई में से भी दूसरों की मदद करती हैं. वे कोई बहुत बड़ा काम नहीं कर रहीं, या तमिलनाडु के समाज को बदल नहीं रहीं. वे जी रहीं हैं और जो वे कर रहीं हैं उससे अभी भी एक उद्देश्य की तरफ ही बढ़ रही हैं.
लक्ष्मी मातम में गाने और नाचने वाली एक एक पेशेवर रुदाली हैं. असल में तमिलनाडु में मृत्यु संस्कार पर पेशेवर विलाप करने वालों को बुलाये जाने की रवायत है. जैसे जैसे लक्ष्मी नगाड़े के कानफाडू शोर पर नाचती है, गाती है, अपनी छाती पीटती है, वैसे वैसे मृतक के परिवार वाले आंसू बहाते हैं और अपनी छाती पीटते हैं. मृत दादी की लाश के सामने यह सब बेहद रूग्ण और विकृत लगता है.

फिल्म की दूसरी नायिका हैं कृष्णवेणी जिनकी जिन्दगी नदी और गलियों में मिली लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार करने से चलती है. कृष्णवेणी इन लाशों को एक टूटी फूटी गाड़ी में ढ़ोती हैं. वे ही इन शवों का अंतिम संस्कार करती हैं. गाँव के बाहर वे गड्ढा खोदती हैं और कभी किन्ही पुरुषों के साथ और कभी अकेले लाशों को दफनाती हैं. दिन ब दिन बिना भावुकता, बिना भावना और बिना दुःख, सीधे-सीधे अंतिम संस्कार संपन्न किया जाता है. कृष्णवेणी अपने दिल की बात कैमरे के आगे बताती हैं कि पुरुषों की इस कठोर दुनिया में वे कैसे जिंदा हैं. वे उन पुरुषों को कोसती हैं जिन्होंने अपनी जिस्मानी जरूरतों और हवस के लिए वर्षों उनका उपयोग किया. और तब वे उनसे उन्हीं की भाषा में पलट कर बात करती हैं. कसाईबाड़े में भी वे काम कर चुकी हैं और आस पास के सारे पुलिस वालों को वे जानती हैं. शुरू से ही सड़कों पर हैं और इसीलिये इतनी चतुर हैं.

तीसरी नायिका सेतुराकु ने स्कूल का मुंह नहें देखा. बजाय इसके वे बचपन से ही समुद्र के पास रहीं. अब वे वृद्ध हो गयी हैं और पुरुषों का काम कहे जाने वाले मछली पकड़ने के धंधे से अपना जीवन यापन करती हैं. वे मछली पकड़ने अकेली समुद्र जाती हैं, जिसकी कोई दूसरी औरत कल्पना भी नहीं कर सकती. दुसरे तो मछली पकड़ने के आधुनिक साजो सामान और मशीनों का इस्तेमाल करते हैं, ऐसे में कभी कभी वे खाली हाथ लौट आती हैं और छोटी सीपियों को गूंथ कर सस्ती माला बनाती हैं जिससे खाने के लिए मांस का जुगाड़ होता है.

निर्देशक ने इन महिलाओं को उनकी चटकीली चेष्टाओं, और गली मुहल्लों की जोरदार आवाजों के साथ यथार्थ में पकड़ा है. गाडेसेज एक जोखिम भरी पर ताकतवर कहानी है जिसे कोई विरला फिल्मकार ही फिल्मांकित करने के लिए चुनेगा. लीना मणिमेकलै ने इस काम को बिना किसी अतिरिक्त निर्माण प्रभाव और चमक-दमक वाली फिल्म तकनीक के बेहद सहजता और बुद्धिमत्ता से किया है.



व्हेन वीमन यूनाईट
निर्देशन- शबनम विरमानी और नाता दुव्वुरी

यह फिल्म राज्य द्वारा सप्लाई की जाने वाली शराब के खिलाफ चले आंदोलन की अविश्वसनीय-सी लगने वाली कहानी कहती है जिसके नतीजे के बतौर 1995 में आंध्र प्रदेश में अन्ततः अरैक की बिक्री पर रोक लगानी पड़ी थी। इस आंदोलन की शुरूआत तब हुई जब साक्षरता अभियान में भाग ले रही महिलाओं के एक समूह ने अपनी दबी हुई पिछड़ी स्थिति के बारे में सवाल करने शुरू किए। गांव की एक महिला की हत्या से इनकी कार्रवाई में गति आ गई ;इस औरत की हत्या उसके नशे में धुत्त पति द्वारा बेतहाशा पिटाई के कारण उस समय हुई, जब वह अपनी बेटी को पति द्वारा की जा रही छेड़छाड़ से बचाने की कोशिश कर रही थी द्ध। वे इस बहादुरी भरे आंदोलन में गांव के उस आदमी, अरैक के उंची पहुंच वाले ठेकेदार और दमनकारी राज्य मशीनरी के खिलाफ उठ खड़ी हुईं।

उनके आंदोलन की यह मांग थी कि उनके गांव में अरैक की अंधाधुंध सप्लाई को रोका जाय ;इस गांव के एकमात्र नल में पानी की सप्लाई तो दो दिन मे एक बार ही आती थी, पर अरैक की दुकान पर शराब की सप्लाई दिन में दो बार होती थीद्ध। लड़ाई के चार सालों मे आंदोलन ने जोर पकड़ा और यह पूरे राज्य में फैल गया। सही मायनों में यह जमीनी आंदोलन था; आज भी इस आंदोलन की किसी विशेष नेता के बारे में नहीं पता चलता है। यह फिल्म इन महिलाओं के अविश्वसनीय साहस, उनकी राजनीतिक और सामाजिक समझदारी और इस दृढ़ अनुभूति को सामने लाती है कि संघर्ष के द्वारा वे अपने भाग्य को जीत सकती हैं।


मालेगांव का सुपरमैन
निर्देशक - फैजा अहमद खान

यह वृत्तचित्र फिल्मों के प्रति प्रेम, उत्साह से भरे शौक और एक भारतीय सुपरमैन के बारे में है। ‘मालेगांव का सुपरमैन’ भारत के भुला दिए गए सुदूर मालेगांव नाम के ही छोटे-से कस्बे में रहने वाले फिल्म निर्माण के शौकीन एक ग्रुप की कहानी है। ये सुपरहिट फिल्मों की पैरोडी बनााना पसंद करते हैं और फिल्म निर्माण उनके लिए धार्मिक तनावों और आर्थिक कठिनाइयों से भागने का मजेदार रास्ता है। हाजिरजवाब, दिल को छूने वाली ओर मजेदार यह फिल्म सुपरमैन की शूटिंग की तैयारियों पर केंद्रित है- उनके इस वर्णन में हाॅलीवुड और बाॅलीवुड आपस में एक-दूसरे को काटते हुए हैं। हरी स्क्रीन और अभिनय न कर सकने वाले कलाकारों के साथ काम करने के कारण शूटिंग के समय उन्हें कई कइिनाइयों का सामना करना पड़ता है, पर अन्त में वे सुपरमैन को उड़ना भी सिखा ही देते हैं। हल्के हास्य का प्रयोग करते हुए यह फिल्म वर्तमान भारत के अंतर्विरोधों पर रोशनी डालती है और इस विश्वास को आगे बढ़ाती है कि जीवन में आनंद इसे सहज और ज्यादा बेहतर बना देता है।


व्हेयर हैव यू माई न्यू क्रिसेन्ट मून ?
निर्देशक- इफत फातिमा


यह फिल्म सन 2009 में ‘आधी विधवाएं’ नाम से चल रहे अभियान के अन्तर्गत कश्मीर में लापता लोगों के अभिभावकों के संगठन के सहयोग से बनाई गई। यह उन परिवारों के सदस्यों का संगठन है जो कश्मीर में अपने लापता परिजनों से सम्बन्धित जानकारी की तलाश में हैं। इनमें अधिकांश लापता होने के लिए बाध्य पीडि़तों की मांएं और बीवियां हैं। ।च्क्च् के कश्मीर और कश्मीर से बाहर लोगों के गायब होने के खिलाफ मुहिम को मदद करने के उद्ेदश्य से इस ‘आधी विधवाएं’ अभियान की शुरूआत 2006 में हुई। वृत्तचित्र फिल्मों के निर्माण के माध्यम से यह अभियान उन महिलाओं के लिए स्थान मुहैया कराने और हिंसा के उनके निजी अनुभवों को व्याख्यायित करने के लिए प्रयासरत है, जिनकी आवाजें वृहद राजनीतिक और फौजी आख्यानों के नीचे दबा दी गई हैं। यह फिल्म मुगलमासी और न्याय व परिवर्तन के लिए उनकी अनवरत खोज को समर्पित है। यह फिल्म यादों, हिंसा और जख्मों के भरने जैसे मुद्दों को सामने लाती है। मुगलमासी कश्मीर के श्रीनगर जिले के हब्बा कदल नाम की जगह पर रहती थीं। पहली सितम्बर, 1990 को उनका इकलौता बेटा नाजिर अहमद तेली लापता हो गया और फिर कभी नहीं मिला। वह अध्यापक था। अप्रैल, 2009 में फिल्म निर्माता ने उनके साथ एक दिन गुजारा, और ...


सब्जी मण्डी के हीरे
निर्देशक- निलिता वाछानी

तरह-तरह के सामान बेचने वालों की भीड़ भारत के अन्तर्राज्यीय बस स्टैंड पर, उनके अपने ही बहुरंगी जीवन कथा की तरह सामानों के बेचने पर मचा युद्ध। खाने के सामानों से लेकर गले के हार, दवा की गोलियां और पेय औषधि तक, सब कुछ। यह लिस्ट कहीं खत्म नहीं होती, सस्ते दामों में मिलने वाले ये सामान अक्सर किसी काम के नहीं होते। कठिन काम, ठसाठस भरीं बसें और दिन लम्बे, निर्दयी। ये सामान बेचने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि उनका सामान नहीं, बल्कि उनका प्रदर्शन बिकता है। तो फिर बसों के रास्ते स्टेज में तब्दील हो जाते हैं जहां ये अभिनेता होते हैं। बालीवुड की फंतासियों में बड़े हुए ये अभिनेता कुछ समय के लिए लाइमलाइट में आ जाते हैं, और किसी तरह से रोजी का जुगाड़ हो जाता हैं।

‘सब्जीमण्डी के हीरे’ अपने चरित्रों के माध्यम से पर्दे के पीछे की भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की पड़ताल करती है। इनमें पहला चरित्र अफसर है, जो कि मेहनती कम्पाउन्डर है ये कुछ-कुछ चीजें मिलाकर बाम पाउडर और पाचक तैयार करता है; दूसरा शकील, अपनी ही तरह का मौजी, जो जीविका के लिए गाना गाने से लेकर आंखों की सजावट के सामान बेचने तक के पेशे में अदला-बदली करता रहता है और तीसरा हशमत, जो अपने ही किए गए जादू के तरीकों के भेद खोलने वाली किताब फेरी लगाकर बेचता है। फिल्म स्टेज के सामने से बैकस्टेज तक लगातार घटती रहती है। उस तीखी टूटन को सामने लाती हुई जो सार्वजनिक को निजी से अलग करती है।

Tuesday, March 22, 2011

आइये, गोरखपुर चलें!



प्रतिरोध का सिनेमा

छठें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल के कार्यक्रमों की रूपरेखा

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के सौ साल पूरे होने पर
अनिल सिन्हा की याद में

23-27 मार्च, गोकुल अतिथि भवन,
सिविल लाइन्स, गोरखपुर

बुधवार
, मार्च 23, 2011

उद्घाटन समारोह
उद्घाटन वक्तव्य - उमा चक्रवर्ती
"हमारे समय के राजनीतिक इतिहास के बतौर व्यक्तिगत पोस्टर संग्रह"
सम्मान समारोह और प्रश्नोत्तर सत्र

हिरावल
, पटना और संकल्प, बलिया का गायन

आफ साइड (93 मिनट, फारसी, 2006)
निर्देशक: जफर पनाही

वृहस्पतिवार
, मार्च, 24, 2011

ग्रुप, जन संस्कृति मंच द्वारा संयोजित
नई फिल्म सोसाइटियों का
पहला सम्मेलन

प्रथम
सत्र -
प्रतिरोध का सिनेमा: एक परिचय
वक्ता: आशुतोष कुमार, अशोक चैधरी, संजय जोशी
अध्यक्षता: जहूर आलम

दूसरा
सत्र -
विभिन्न समूहों का परिचय

तीसरा सत्र -
प्रतिरोध का सिनेमा, फिल्म फेस्टिवल कैसे आयोजित करें: नीतियां और रणनीतियां
संयोजन - मनोज सिंह, संजय जोशी, जहूर आलम, कौशल किशोर, संतोष झा

भोजनावकाश


चौथा सत्र -
प्रतिरोध का सिनेमा, फिल्म फेस्टिवल कैसे आयोजित करें: तकनीक और संगठन
संयोजनः नितिन और संजय जोशी

पांचवां
सत्र -
वर्ष 2011 में विशेष सवालों पर केंद्रित प्रतिरोध का सिनेमा फिल्म फेस्टिवल आयोजित करने के कैलेण्डर की तैयारी

छठां सत्र -
राष्ट्रीय टीम का गठन और मनोज सिंह द्वारा धन्यवाद ज्ञापन

चाय

बल्ली
सिंह चीमा
का सम्मान
और काव्यपाठ

संकल्प
, बलिया का सम्मान और
उनके द्वारा बिदेसिया का गायन

गोरखपुर फिल्म सोसायटी की पहलकदमी-
तीन असंपादित डाक्यूमेंट्रियों का प्रदर्शन

अशोक भौमिक द्वारा
पहला अनिल सिन्हा स्मृति वक्तव्य
विषय-
चित्तप्रसाद और भारतीय पेंटिंग की प्रगतिशील परंपरा

भूमिका
(140 मिनट, 1977, हिंदी)
निर्देशक - श्याम बेनेगल

शुक्रवार
, मार्च 25, 2011

द अदर सांग
(120 मिनट, 2009, हिंदी/उर्दू)
निर्देशक - सबा दीवान

फॉर
माया (37 मिनट, 1997, हिंदी/कुमाऊंनी/ अंग्रेजी)
निर्देशक - वसुधा जोशी

भोजनावकाश


कमलाबाई
(47 मिनट, 1992, हिंदी/मराठी)
निर्देशक- रीना मोहन

एडवोकेट
(130 मिनट, 2008)
निर्देशक - दीपा धनराज

चाय


मैं
तुम्हारा कवि हूं

(कवि विद्रोही पर एक फिल्म)
निर्देशक - नितिन के.
फिल्म प्रदर्शन के बाद सवाल-जवाब होंगे.


कवि
विद्रोही का सम्मान
और काव्यपाठ


शनिवार
, 26 मार्च, 2011

ससुराल
(30 मिनट )
निर्देशक - मीरा दीवान

सिटी ऑफ़ फोटोज़ (59 मिनट, 2005, अंग्रेजी / हिंदी)
निर्देशक- निशिता जैन

गाडेसेज़
(42 मिनट, 2007, तमिल)
निर्देशक- लीना मणिमेक्कलइ

परिसंवाद
मीडिया और समकालीन चुनौतियां

भोजनावकाश

व्हेन वीमन यूनाइट (80 मिनट, 1996, तेलुगू, हिंदी सबटाइटल के साथ)
निर्देशक - शबनम विरमानी

भारत
में संगीत रिकार्डिंग के सौ वर्ष

निर्देशक - कमलिनी दत्त

चाय


सुपरमैन
ऑफ़ मालेगांव (52 मिनट, 2008, उर्दू/हिंदी)
निर्देशक - फैजा अहमद खान

व्हेयर
हैव यू हिडेन माई न्यू क्रिसेन्ट मून?
(28 मिनट, 2009)
निर्देशक- इफत फातिमा
सम्मान और प्रश्नोत्तर

सबद
निरंतर
(74 मिनट, 2008, हिंदी)
निर्देशक - राजुला शाह

रविवार
, 27 मार्च, 2011

(बच्चों का सत्र)

व्हाइट
बैलून
(84 मिनट, 1995, फारसी)
निर्देशक- जफर पनाही

अंतरिक्ष
विज्ञान कार्यशाला
(90 मिनट)
उषा श्रीनिवासन के साथ

भोजनावकाश


सब्जी
मंडी के हीरे
(68 मिनट, 1992, हिंदी/उर्दू)
निर्देशक- निलिता वछानी

मोरालिटी टीवी एंड द लविंग जेहाद (31 मिनट, 2007, हिंदी/अंग्रेजी)
निर्देशक- पारोमिता वोहरा
सम्मान और प्रश्नोत्तर

मेरा अपना शेखर (70 मिनट, 2011, हिंदी)
निर्देशक - समीरा जैन

परिचर्चा

भोजपुरी सिनेमा के 50 साल
अध्यक्षता- लाल बहादुर ओझा

चाय


पी
.ओ.
बॉक्स 418, सियासत कानपुर (35 मिनट, 2011, उर्दू)
निर्देशक- साजिया इल्मी
सम्मान और प्रश्नोत्तर

संपर्क
- मनोज सिंह
संयोजक, एक्सप्रेशन - गोरखपुर फिल्म सोसायटी
manoj.singh2171@gmail.com

संजय जोशी
संयोजक, ग्रुप, जन संस्कृति मंच
thegroup.jsm@gmail.com

Saturday, February 26, 2011

संस्कृतिकर्मी अनिल सिन्हा नहीं रहे


प्रिय साथियों,
अबतक आप सबको साथी अनिल सिन्हा के असमय गुज़र जाने का अत्यंत दुखद समाचार मिल चुका होगा.. अनिल जी जैसा सादा और उंचा इंसान , उनके जैसा संघर्ष से तपा निर्मल व्यक्तित्व, क्रांतिकारी वाम राजनीति और संस्कृति -कर्म का अथक योदधा अपने पीछे कितना बड़ा सूनापन छोड़ गया है, अभी इसका अहसास भी पूरी तरह नहीं हो पा रहा. यह भारी दुःख जितना आशा जी, शाश्वत, ऋतु,निधि,अनुराग , अरशद और अन्य परिजन तथा मित्रों का है उतना ही जन संस्कृति के सभी सह-कर्मियों का भी. हमने एक ऐसा साथी खोया है जिससे नयी पीढी को बहुत कुछ सीखना था, कृतित्व से भी और व्यक्तित्व से भी. हमारे सांस्कृतिक आन्दोलन के हर पड़ाव के वे साक्षी ही नहीं, निर्माताओं में थे. कलाओं के अंतर्संबंध पर जनवादी- प्रगतिशील नज़रिए से गहन विचार और समझ विकसित करनेवाले विरले समीक्षक, मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता के मानक व्यक्तित्व के रूप में वे प्रगतिशील संस्कृति कर्म के बाहर के भी दायरे में अत्यंत समादृत रहे. उनके रचनाकार पर तो अलग से ही विचार की ज़रुरत है. जन संस्कृति मंच अपने आन्दोलन के इस प्रकाश स्तम्भ की विरासत को आगे बढाने का संकल्प लेते हुए कामरेड अनिल सिन्हा को श्रद्धांजलि व्यक्त करता है. हम साथी कौशल किशोर द्वारा अनिल जी के जीवन और व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने वाली संक्षिप्त टिप्पणी नीचे दे रहे हैं.
प्रणय कृष्ण, महासचिव , जन संस्कृति मंच

जाने - माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे

लखनऊ, 25 फरवरी। जाने माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे। आज 25 फरवरी को दिन के 12 बजे पटना के मगध अस्पताल में उनका निधन हुआ। 22 फरवरी को जब वे दिल्ली से पटना आ रहे थे, ट्रेन में ही उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ। उन्हें पटना के मगध अस्पताल में अचेतावस्था में भर्ती कराया गया। तीन दिनों तक जीवन और मौत से जूझते हुए अखिरकार आज उन्होंने अन्तिम सांस ली। उनका अन्तिम संस्कार पटना में ही होगा। उनके निधन की खबर से पटना, लखनऊ, दिल्ली, इलाहाबाद आदि सहित जमाम जगहों में लेखको, संस्कृतिकर्मियों के बीच दुख की लहर फैल गई। जन संस्कृति मंच ने उनके निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है। उनके निधन को जन सांस्कृतिक आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति बताया है।

ज्ञात हो कि अनिल सिन्हा एक जुझारू व प्रतिबद्ध लेखक व पत्रकार रहे हैं। उनका जन्म 11 जनवरी 1942 को जहानाबाद, गया, बिहार में हुआ। उन्होंने पटना विशविद्दालय से 1962 में एम. ए. हिन्दी में उतीर्ण किया। विश्वविद्दालय की राजनीति और चाटुकारिता के विरोध में उन्होंने अपना पी एच डी बीच में ही छोड़ दिया। उन्होंने कई तरह के काम किये। प्रूफ रीडिंग, प्राध्यापिकी, विभिन्न सामाजिक विषयों पर शोध जैसे कार्य किये। 70 के दशक में उन्होंने पटना से ‘विनिमय’ साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो उस दौर की अत्यन्त चर्चित पत्रिका थी। आर्यवर्त, आज, ज्योत्स्ना, जन, दिनमान से वे जुड़े रहे। 1980 में जब लखनऊ से अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ उन्होंने इस अखबार में काम किया। अमृत प्रभात लखनऊ में बन्द होने के बाद में वे नवभारत टाइम्स में आ गये। दैनिक जागरण, रीवाँ के भी वे स्थानीय संपादक रहे। लेकिन वैचारिक मतभेद की वजह से उन्होंने वह अखबार छोड़ दिया।

अनिल सिन्हा बेहतर, मानवोचित दुनिया की उम्मीद के लिए निरन्तर संघर्ष में अटूट विश्वास रखने वाले रचनाकार रहे हैं। वे मानते रहे हैं कि एक रचनाकार का काम हमेशा एक बेहतर समाज का निर्माण करना है, उसके लिए संघर्ष करना है। उनका लेखन इस ध्येय को समर्पित है। वे जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में थे। वे उसकी राष्ट्रीय परिषद के सदस्य थे। वे जन संस्कृति मंच उत्तर प्रदेश के पहले सचिव थे। वे क्रान्तिकारी वामपंथ की धारा तथा भाकपा (माले) से भी जुड़े थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट जेसे क्रान्तिकारी संगठन के गठन में भी उनकी भूमिका थी। इस राजनीति जुड़ाव ने उनकी वैचारिकी का निर्माण किया था।

कहानी, समीक्षा, अलोचना, कला समीक्षा, भेंट वार्ता, संस्मरण आदि कई क्षेत्रों में उन्होंने काम किया। ‘मठ’ नम से उनका कहानी संग्रह पिछले दिनों 2005 में भावना प्रकाशन से आया। पत्रकारिता पर उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हिन्दी पत्रकारिता: इतिहास, स्वरूप एवं संभावनाएँ’ प्रकाशित हुई। पिछले दिनों उनके द्वारा अनुदित पुस्तक ‘सामा्राज्यवाद का विरोध और जतियों का उन्मुलन’ छपकर आया थ। उनकी सैकड़ों रचनाएँ पत्र पत्रिकाओं में छपती रही है। उनका रचना संसार बहुत बड़ा है , उससे भी बड़ी है उनको चाहने वालों की दुनिया। मृत्यु के अन्तिम दिनों तक वे अत्यन्त सक्रिय थे तथा 27 फरवरी को लखनऊ में आयोजित शमशेर, नागार्जुन व केदार जन्तशती आयोजन के वे मुख्य कार्यकर्ता थे।

उनके निधन पर शोक प्रकट करने वालों में मैनेजर पाण्डेय, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, आलोक धन्वा, प्रणय कृष्ण, रामजी राय , अशोक भैमिक, अजय सिंह, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, राजेन्द्र कुमार, भगवान स्वरूप् कटियार, राजेश कुमार, कौशल किशोर, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, चन्द्रेश्वर, वीरेन्द्र यादव, दयाशंकर राय, वंदना मिश्र, राणा प्रताप, समकालीन लोकयुद्ध के संपादक बृजबिहारी पाण्डेय, ज़हूर आलम, बल्ली सिंह चीमा, अशोक चौधरी, के के पाण्डेय, मनोज सिंह आदि रचनाकार- पत्रकार प्रमुख हैं। अपनी संवेदना प्रकट करते हुए जारी वक्तव्य में रचनाकारों ने कहा कि अनिल सिन्हा आत्मप्रचार से दूर ऐसे रचनाकार रहे हैं जो संघर्ष में यकीन करते थे। इनकी आलोचना में सृर्जनात्मकता और शालीनता दिखती है। ऐसे रचनाकार आज विरले मिलेंगे जिनमे इतनी वैचारिक प्रतिबद्धता और सृर्जनात्मकता हो। इनके निधन से लेखन और विचार की दुनिया ने एक अपना सच्चा व ईमानदार साथी खो दिया है।

कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ