पांचवें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल की स्मारिका का लोकार्पण करते जन संस्कृति मंच के महसचिव प्रणय कृष्ण, फ़िल्मकार कुंदन शाह, सईद मिर्जा और अजय कुमारफ़िल्मों में बिखरी प्रतिरोध की चेतना को प्रतिरोध की कारगर शक्ति बनाने का सांस्कृतिक अभियान
Wednesday, February 10, 2010
पांचवे गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल की कुछ तस्वीरें
पांचवें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल की स्मारिका का लोकार्पण करते जन संस्कृति मंच के महसचिव प्रणय कृष्ण, फ़िल्मकार कुंदन शाह, सईद मिर्जा और अजय कुमारMonday, February 1, 2010
पांचवे गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल का पोस्टर रिलीज

सोमवार को दोपहर एक बजे गोरखपुर प्रेस क्लब के सभागार में जन संस्कृति मंच और गोरखपुर फिल्म सोसाइटी द्वारा 4-7 फरवरी को आयोजित पांचवे गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल का पोस्टर रिलीज किया गया। पोस्टर रिलीज करने के मौके पर आयोजन समिति के वरिष्ठ सदस्य कथाकार मदन मोहन, आलोचक कपिलदेव, संस्कृति कर्मी रामू सिद्धार्थ, डा चन्द्रभूषण अंकुर, आरिफ अजीज लेनिन, गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयोजक मनोज कुमार सिंह, अशोक चैधरी, डा मुमताज खान, स्वदेश, चक्रपाणि, मनीष चैबे, सुधीर आदि उपस्थित थे। इस मौके पर आयोजन समिति के सदस्यों ने कहा कि पांचवा गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल समाज में हाशिए के लोगों और उनके जीवन संघर्षों को सम्बोधित है। इसी को केन्द्र में रखकर फीचर, डाक्यूमेंटरी, लघु और एनिमेशन फिल्मों का चयन किया गया है। गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल अन्य फिल्म उत्सवों की तरह फिल्मों को दिखाने का सिर्फ एक मंच नहीं है बल्कि हम इस आयोजनं के जरिए देश और दुनिया में आम लोगों की स्थितियों, उनकी समस्याओं, संघर्ष के साथ सत्ता की राजनीति को देखना और समझना चाहते हैं। यह फिल्म फेस्टिवल सिनेमा में उस आम आदमी की आवाज है जो शोषण, अन्याय, भेदभाव, असमानता का सामना कर रहा है और इन स्थितियों को स्वीकार करने से इनकार करता है। इसलिए हम इसे प्रतिरोध का सिनेमा कहते है। इसकी यात्रा पांच वर्ष पहले 2006 में गोरखपुर से ही शुरू हुई थी। इन पांच वर्षों में गोरखपुर लगातार फिल्म फेस्टिवल का आयोजन तो हुआ ही देश के दूसरे शहरों लखनउ, भिलाई, नैनीताल, बरेली, इलाहाबाद, पटना आदि स्थानांे पर इस तरह के आयोजन हुए। गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल की तरह अब तक कुल 12 फिल्म फेस्टिवल का आयोजन हो चुका है।
Friday, December 25, 2009
पटना फिल्म फेस्टिवल का उद्घाटन
पहला पटना फिल्म फेस्टिवल प्रारंभ
पटना के इण्डस्टीज एसोसिएशन के सभागार में 25 दिसम्बर को अपरान्ह तीन बजे से पहला पटना फिल्म फेस्टिवल शुरू हुआ। तीन दिन तक चलने वाले इस फिल्म फेस्टिवल में 16 फिल्में दिखाई जाएंगी। जनसंस्कृति मंच और हिरावल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस फिल्म फेस्टिवल की उद्घाटन फिल्म गुलाबी टाकीज थी। राष्टीय पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म के निर्माता-निर्देशक प्रसिद्ध फिल्मकार गिरीश कसरावल्ली भी इस मौके पर मौजूद थे। श्री कसरावल्ली ने इस मौके पर तथा फेस्टिवल शुरू होने के पहले पत्रकारों से अपनी फिल्मों के अलावा सिनेमा परिदृश्य पर बातचीत करते हुए कहा कि मै अंग्रेजी भाषा में इसलिए फिल्में नहीं बनाता क्योंकि मेरे पात्र वंचित और हाशिए पर पड़े लोग हैं। वे न तो अंग्रेजी बोलते हैं और न ही उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए मै उन्ही की भाषा में फिल्म बनाता हूं। मै चाहता हूं कि मेरी फिल्मों की डबिंग हिन्दी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में हो क्यांेकि मै अपने सिनेमा का मैसेज उन लोगों तक पहुंचाना चाहता हूं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि और बालीवुड की फिल्मों से दुनिया की सही तस्वीर सामने नहीं आती। असली सचाई तो अर्थपूर्ण सिनेमा को देखने से पता चलती है। इस सिलसिले में उन्होंने इरानी सिनेमा का विशेष रूप से जिक्र्र करते हुए कहा की मीडिया ने दुनिया के लोगों के सामने इरान की एक खास इमेज प्रस्तुत की है लेकिन वहां का सिनेमा असली इरान की तस्वीर प्रस्तुत करता है। उन्हांेने जनसंस्कृति मंच द्वारा प्रतिरोध के सिनेमा के तहत देश के विभिन्न स्थानों पर फिल्म फेस्टिवल के आयोजन को सार्थक और अर्थपूर्ण फिल्मों को आम जनता तक पहुंचाने का अभिनव प्रयोग बताया।
इसके पूर्व फेस्टिवल का उद्घाटन करते हुए जनसंस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि प्रतिरोध का सिनेमा हाशिए पर फेंक दिए गए उत्पीड़ित लोगों की पीड़ा, उसके पीछे के कारणों और प्रतिरोध की ताकत को सामने लाता है। प्रतिरोध के सिनेमा का आन्दोलन आज दुनिया भर में चल रहे स्थानीय जनता के भूमण्डलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के खिलाफ आन्दोलनों को ताकत देने का काम कर रहा है। आज भले ही भारत में सत्ता की तमाम पार्टियां उदारीकरण की नीतियों को लागू कर रही हैं लेकिन बगैर किसी झण्डा, बैनर के भी देश भर में भूमण्डलीेकरण का दंश झेल रहे आदिवासी, किसान, मजदूर उसके खिलाफ बहादुरी से लड़ रहे हैं। इन आन्दोलनों को एक सूत्र में पिरोना ही आज की प्रतिरोध की ताकतों का मुख्य कार्यभार है। सिनेमा आन्दोलन अगर इसमें मदद करेगा तो बदलाव और व्यवस्था परिवर्तन की ताकतें मजबूत होंगी। उद्घाटन कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि अरूण कमल ने की। अतिथियांे का स्वागत प्रो नवल किशोर चैधरी ने किया। इस मौके पर फिल्मकार अरविन्द सिन्हा, श्रीप्रकाश आदि उपस्थित थे। जनसंस्कृति मंच के द ग्रुप केे संयोजक फिल्मकार संजय जोशी ने बताया कि प्रतिरोध के सिनेमा पर पटना में आयोजित होने वाला फिल्म फेस्टिवल 12वां फिल्म फेस्टिवल है। हम ये आयोजन किसी कारपोरेट हाउस या पूंजीपतियों के पंैसे से नहीं बल्कि जनता की ताकत के भरोसे कर रहे हैं।उद्घाटन फिल्म गुलाबी टाकीज अपनी दुर्दिन में भी जिजीविषा बनाए रखने वाली एक महिला के वर्तमान अनुभव को परिकथा के अंदाज वाले सिनेमाई रूप में पेश करने के लिए गिरीश कसरावल्ली ने बहुचर्चित कलाकार वैदेही की एक लघुकथा के रूपान्तरण को आधार बनाया है।
इसके पूर्व फेस्टिवल का उद्घाटन करते हुए जनसंस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि प्रतिरोध का सिनेमा हाशिए पर फेंक दिए गए उत्पीड़ित लोगों की पीड़ा, उसके पीछे के कारणों और प्रतिरोध की ताकत को सामने लाता है। प्रतिरोध के सिनेमा का आन्दोलन आज दुनिया भर में चल रहे स्थानीय जनता के भूमण्डलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के खिलाफ आन्दोलनों को ताकत देने का काम कर रहा है। आज भले ही भारत में सत्ता की तमाम पार्टियां उदारीकरण की नीतियों को लागू कर रही हैं लेकिन बगैर किसी झण्डा, बैनर के भी देश भर में भूमण्डलीेकरण का दंश झेल रहे आदिवासी, किसान, मजदूर उसके खिलाफ बहादुरी से लड़ रहे हैं। इन आन्दोलनों को एक सूत्र में पिरोना ही आज की प्रतिरोध की ताकतों का मुख्य कार्यभार है। सिनेमा आन्दोलन अगर इसमें मदद करेगा तो बदलाव और व्यवस्था परिवर्तन की ताकतें मजबूत होंगी। उद्घाटन कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि अरूण कमल ने की। अतिथियांे का स्वागत प्रो नवल किशोर चैधरी ने किया। इस मौके पर फिल्मकार अरविन्द सिन्हा, श्रीप्रकाश आदि उपस्थित थे। जनसंस्कृति मंच के द ग्रुप केे संयोजक फिल्मकार संजय जोशी ने बताया कि प्रतिरोध के सिनेमा पर पटना में आयोजित होने वाला फिल्म फेस्टिवल 12वां फिल्म फेस्टिवल है। हम ये आयोजन किसी कारपोरेट हाउस या पूंजीपतियों के पंैसे से नहीं बल्कि जनता की ताकत के भरोसे कर रहे हैं।उद्घाटन फिल्म गुलाबी टाकीज अपनी दुर्दिन में भी जिजीविषा बनाए रखने वाली एक महिला के वर्तमान अनुभव को परिकथा के अंदाज वाले सिनेमाई रूप में पेश करने के लिए गिरीश कसरावल्ली ने बहुचर्चित कलाकार वैदेही की एक लघुकथा के रूपान्तरण को आधार बनाया है।
Tuesday, December 15, 2009
मानवाधिकार दिवस पर गोरखपुर में फिल्म शो
मानवाधिकार दिवस पर पूर्वांचल में भुखमरी पर बनी डाक्यूमेन्ट्री दिखाई गई
गोरखपुर। डाक्यूमेन्ट्री फिल्म एनआदर आस्पेक्ट आफ इंडिया राइजिंग-डेथ बाई स्टारवेशन, गोरखपुर, कुशीनगर सहित कई जिलों में भुखमरी से मौतों के कारणों की जांच-पड़ताल करने वाली फिल्म है। यह फिल्म गरीबों तक सरकारी योजनाओं की पहुंचाने में सरकारी विफलता और शासन-प्रशासन की असंवेदनशीलता को सामने लाती है।मानवाधिकार दिवस पर प्रेस क्लब सभागार में गुरूवार की शाम इस फिल्म का शो हुआ। यह आयोजन गोरखपुर फिल्म सोसाइटी ने किया था। इस फिल्म को सच्चिदानंद मिश्र और विजय प्रकाश मौर्य ने बनाया है। ये दोनों युवक देवरिया जिले के रहने वाले हैं। पौन घंटे की इस फिल्म में नगीना मुसहर, शिवनाथ मुसहर से लेकर भिखारी, नारायण, पूजा, सोनू, विनोद गौड़, विकाउ चैहान, भीखी मल्लाह, तेजू निषाद सहित कुपोषण और भूख से मरे 22 व्यक्तियों के परिजनों, ग्रामीणों तथा भूख से हुई मौतों को कवर करने वाले पत्रकारों से बातचीत व साक्षात्कार तथा दस्तावेजों के अध्ययन पर आधारित इस फिल्म के कई दृश्य बहुत ही मार्मिक बन पड़े हैं। फिल्म के एक दृश्य में अपने पति और बच्चे को खो देने वाली महिला कहती है कि अपने बच्चों को भूख से बचाने के लिए किसके सामने हाथ पसारे ? यह एक दिन की बात तो नहीं है। यह तो रोज-रोज का है। इसी तरह एक दृश्य में भूख से मर गए दो बच्चों का पिता मीडिया कर्मियों को देखते ही गाली देने लगता है और कहता है कि उसकी रोज फोटो ली जा रही है लेकिन मदद के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है। फिल्म का शो शुरू होने के पहले गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयोजक मनोज कुमार सिंह ने फिल्म और इसके निर्माता-निर्देशक सच्चिदानंद मिश्र व विजय प्रकाश मौर्य के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि गोरखपुर-बस्ती मण्डल के सात जिलों में वर्ष 2004 से अब तक भुखमरी से 70 से अधिक मामले आ चुके हैं लेकिन सरकार-प्रशासन ने एक भी मौत को स्वीकार नहीं किया है। यह फिल्म भुखमरी के कारणों की न केवल जांच-पड़ताल करती है बल्कि ग्रामीण गरीबों को जिंदा रहने के जद्दोजेहद को सामने लाते हुए सरकार की लफफाजी का पर्दाफाश करती है। फिल्म के प्रोड्यूसर और निर्देशक सच्चिदानंद ने फिल्म निर्माण से जुड़े अनुभवों की चर्चा करते हुए कहा कि उन्हें इसे बनाने में आठ महीने लगे और उन्हें उम्मीद है कि यह फिल्म लोगों को इस संवेदनशील मुद्दे पर झकझोरने का काम करेगी। इस मौके पर राजा राम चैधरी, कथाकार रवि राय, आसिफ सईद, आरिफ अजीज लेनिन, रामू सिद्धार्थ, नितेन अग्रवाल, अशोक चैधरी, मनीष चैबे, बैजनाथ मिश्र, सुधीर, मनोज सिंह एडवोकेट आदि उपस्थित थे।
मनोज
गोरखपुर। डाक्यूमेन्ट्री फिल्म एनआदर आस्पेक्ट आफ इंडिया राइजिंग-डेथ बाई स्टारवेशन, गोरखपुर, कुशीनगर सहित कई जिलों में भुखमरी से मौतों के कारणों की जांच-पड़ताल करने वाली फिल्म है। यह फिल्म गरीबों तक सरकारी योजनाओं की पहुंचाने में सरकारी विफलता और शासन-प्रशासन की असंवेदनशीलता को सामने लाती है।मानवाधिकार दिवस पर प्रेस क्लब सभागार में गुरूवार की शाम इस फिल्म का शो हुआ। यह आयोजन गोरखपुर फिल्म सोसाइटी ने किया था। इस फिल्म को सच्चिदानंद मिश्र और विजय प्रकाश मौर्य ने बनाया है। ये दोनों युवक देवरिया जिले के रहने वाले हैं। पौन घंटे की इस फिल्म में नगीना मुसहर, शिवनाथ मुसहर से लेकर भिखारी, नारायण, पूजा, सोनू, विनोद गौड़, विकाउ चैहान, भीखी मल्लाह, तेजू निषाद सहित कुपोषण और भूख से मरे 22 व्यक्तियों के परिजनों, ग्रामीणों तथा भूख से हुई मौतों को कवर करने वाले पत्रकारों से बातचीत व साक्षात्कार तथा दस्तावेजों के अध्ययन पर आधारित इस फिल्म के कई दृश्य बहुत ही मार्मिक बन पड़े हैं। फिल्म के एक दृश्य में अपने पति और बच्चे को खो देने वाली महिला कहती है कि अपने बच्चों को भूख से बचाने के लिए किसके सामने हाथ पसारे ? यह एक दिन की बात तो नहीं है। यह तो रोज-रोज का है। इसी तरह एक दृश्य में भूख से मर गए दो बच्चों का पिता मीडिया कर्मियों को देखते ही गाली देने लगता है और कहता है कि उसकी रोज फोटो ली जा रही है लेकिन मदद के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है। फिल्म का शो शुरू होने के पहले गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयोजक मनोज कुमार सिंह ने फिल्म और इसके निर्माता-निर्देशक सच्चिदानंद मिश्र व विजय प्रकाश मौर्य के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि गोरखपुर-बस्ती मण्डल के सात जिलों में वर्ष 2004 से अब तक भुखमरी से 70 से अधिक मामले आ चुके हैं लेकिन सरकार-प्रशासन ने एक भी मौत को स्वीकार नहीं किया है। यह फिल्म भुखमरी के कारणों की न केवल जांच-पड़ताल करती है बल्कि ग्रामीण गरीबों को जिंदा रहने के जद्दोजेहद को सामने लाते हुए सरकार की लफफाजी का पर्दाफाश करती है। फिल्म के प्रोड्यूसर और निर्देशक सच्चिदानंद ने फिल्म निर्माण से जुड़े अनुभवों की चर्चा करते हुए कहा कि उन्हें इसे बनाने में आठ महीने लगे और उन्हें उम्मीद है कि यह फिल्म लोगों को इस संवेदनशील मुद्दे पर झकझोरने का काम करेगी। इस मौके पर राजा राम चैधरी, कथाकार रवि राय, आसिफ सईद, आरिफ अजीज लेनिन, रामू सिद्धार्थ, नितेन अग्रवाल, अशोक चैधरी, मनीष चैबे, बैजनाथ मिश्र, सुधीर, मनोज सिंह एडवोकेट आदि उपस्थित थे।
मनोज
Saturday, November 14, 2009
नैनीताल फिल्म फेस्टिवल के बहाने
लंबे अरसे से सोचता था कि नैनीताल में कोई फिल्म फेस्टिवल किया जाए. दोस्तों के साथ मिलकर योजना बनाने की कोशिश भी की. लेकिन कभी कुछ तय नहीं हो पाया. इस बार पता चला कि अपने ही कुछ पुराने साथी वहां पर फिल्म फेस्टिवल की तैयारी कर रहे हैं तो मैं भी साथ में जुट गया. फेस्टिवल क़रीब आने पर दोस्तों से मिलने की ख़्वाहिश लिए मैं दिल्ली से नैनीताल के लिए निकल पड़ा. हमें उत्तराखंड संपर्क क्रांति से हल्द्वानी तक जाना था. साथ में भारत भी था. शाम चार बजे की ट्रेन थी लेकिन हम तीन बजे ही स्टेशन पहुंच गए. ऐसा बहुत कम हुआ है कि संपर्क क्रांति वक़्त पर चले. यही सोचकर पिछले महीने जब हल्द्वानी जाने के लिए स्टेशन पहुंचा तो ट्रेन प्लेटफॉर्म छोड़ रही थी. तबीयत कुछ ख़राब थी. ऐसे में शारीरिक थकान तो थी ही मानसिक तौर पर भी बड़ी मुश्किल हुई. उस दिन टिकट कैंसल कर दूसरे दिन ट्रेन पकड़ी थी. इस बार पहले से ही तय कर लिया था कि निर्धारित वक़्त से पहले ही प्लेटफ़ार्म पर पहुंच जाएंगे. नतीज़ा ये हुआ कि पूरे एक घंटे प्लेटफ़ार्म पर इंतज़ार करना पड़ा.
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर छह से काठगोदाम के लिए ट्रेन चली तो रिजर्व्ड डिब्बों में भी लोग ठूंस-ठूंस कर भरे हुए थे. कुछ सोते, कुछ जागते और कुछ पढ़ते रात के ग्यारह बजे हल्द्वानी पहुंचे. ट्रेन एक घंटा लेट थी. किसी रिश्तेदार के घर जाने की बजाय पुराने दोस्त और पत्रकार जहांगीर के पास जाना मुझे ज़्यादा ठीक लगा. वहां पहुंचा तो वो अतीत की बातें करता रहा. कुछ दोस्तों के फोन नंबर उसके पास थे. उनसे बात करवाता रहा. इस बीच भरी जवानी में साथ छोड़ चुके दोस्तों को भी हम याद करते रहे. कभी जो गहरे दोस्त थे और अब अजनबी बन चुके हैं ऐसे रिश्तों की बातें भी बीच में आईं. हम सोचते रहे कि छोटे से वक़्त में कितना कुछ बदल गया है.
सुबह जहांगीर अपनी गाड़ी से टैक्सी स्टैंड तक छोड़कर गया. शेयर्ड टैक्सी जैसे ही काठगोदाम से ऊपर की ओर चली अगली सीट पर बैठा मैं बाक़ी सवारियों से बेख़बर पहाड़ों को गौर से देख रहा था. हवा, पानी, पेड़, पत्थर, ज़मीन सब जाने-पहचाने लग रहे थे. मैं पुराने दिनों को पकड़ने की कोशिश कर रहा था. अचानक लगा कि दिल्ली में रहते मैं इस मिट्टी की गंध से कितना दूर हो गया हूं. नैनीताल समाचार के संपादक राजीव लोचन साह मुझ जैसे लोगों को स्वर्ग से ठुकराए हुए लोग यूं ही नहीं कहते. ख़ैर, आधे रास्ते में पता चला कि पिछली सीट में विवेक दा भी बैठे हैं. वो कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता हैं. पिछले कई सालों से दिल्ली में थे अब उत्तराखंड में पार्टी का काम देखते हैं. उन्होंने ही पहचानते हुए पीछे से मेरा नाम पुकारा. मिलकर अच्छा लगा. फिर रास्ते में वो उत्तराखंड में प्राकृतिक संसाधनों की लूट की कहानी बताते रहे. ज़ोर देते रहे कि मैं इस बारे में ज़रूर कुछ लिखूं. उन्होंने ये भी बताया कि कैसे पूरे राज्य में माओवाद का हौव्वा खड़ा कर आंदोलनकारियों पर लगाम कसी जा रही है. पिछले साल पीयूसीएल और पीयूडीआर की तरफ़ से उत्तराखंड आयी फैक्ट फाइंडिंग कमेटी में मैं भी शामिल था. इसलिए मुझे उनकी इस बात की गंभीरता पता थी. हम लोग प्रभाष जोशी की मौत और आज की बाज़ारू पत्रकारिता पर भी बात करते रहे.
नैनीताल मुझे हमेशा से लुभाता रहा है. लेकिन इस बार जब वहां पहुंचा तो लगा कि शहर का रंग उड़ा हुआ है. ये बात मैंने विवेक दा से पूछी. उन्होंने याद दिलाया कि पतझड़ का महीना है. लेकिन मैं सोचता रहा कि आसपास सदाबहार जंगल होने के बाद भी शहर में पतझड़ का इतना असर क्यों है. शायद बाहर से लाकर ज़बरदस्ती यहां लगाए गए पेड़ों की वजह से ऐसा था. पूरे माहौल में मुझे एक नकलीपन जैसा लगा. हम तल्लीताल से रिक्शे पर मल्लीताल के लिए निकले. मुझे अतीत में यहां बिताए दिन याद आते रहे. मॉल रोड से गुजरते हुए मैं हर आदमी और दृश्य को पहचानने की कोशिश कर रहा था. लेकिन सैलानी जोड़ों और दुकानों की चमक-दमक के बीच अपना जैसा कुछ भी नहीं लगा.
शैले हॉल में पहले नैनीताल फिल्म फेस्टिवल की गहमा-गहमी थी. शहर में घुसते ही जो वीराना और अजनबीपन लगा था. यहां आकर वो पूरी तरह दूर गया. एक साथ ढेर सारे जाने-पहचाने चेहरे मिले. जिनसे मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी ऐसे साथियों से मिलने का सुख बयान नहीं किया जा सकता. तब लगा नहीं कि वक़्त ने हम सबको एक-दूसरे से कितना दूर कर दिया है. स्कूली दिनों का साथी प्रकाश इतने सालों बाद अचानक मिल गया. उसने बताया कि आजकल वो कहीं एसडीएम है.
ज़िंदगी के अलग-अलग इलाक़ों से लोग यहां पहुंचे थे. कोई आंदोलनों में सक्रिय था तो कोई रंगमंच में, कोई साहित्य में तो कोई सिनेमा में. सब से कोई न कोई पुराना रिश्ता. वे पूरी आत्मीयता से अपने-अपने विषय की बात बताते रहे. आंदोलन वाले मुझसे आंदोलनकारी की तरह बोल रहे थे तो रंगमंच वाले रंगकर्मी की तरह. साहित्य वाले और सिनेमा वालों का भी यही अंदाज़ था. मुझे लगा कि हर रास्ते में चलने की कोशिश में मैं उलझकर रह गया. मुझसे अच्छे तो वो साथी है जिन्होंने गंभीरता से कोई काम किया.
वीरेनदा हमेशा की तरह हुलसकर गले मिले. तो त्रिनेत्र जोशी ने भी सदाबहार मुस्कान के साथ स्वागत किया. इलाहाबाद से प्रणय कृष्ण, कानपुर से पंकज चतुर्वेदी और दिल्ली से अजय भारद्वाज चंद्रशेखर पर बनाई फिल्म एक मिनट का मौन के साथ पहुंचे थे. ज़हूर दा में आज भी वही पुरानी सक्रियता दिख रही थी. शेखर पाठक दोनों दिन डटे रहे. उन्होंने बताया कि वो इन दिनों हिमालयी इलाक़ों में औपनिवेशिक घुसपैठ के ऐतिहासिक अध्ययन को पूरा करने में जुटे हैं. इसके लिए उन्होंने फिर से पूरे हिमालयी इलाक़ों की खाक छान मारी है. बटरोही और गिर्दा भी प्यार से मिले. राजा बहुगुणा, गिरिजा पाठक, कैलाश, केके से मिलकर भी अच्छा लगा. त्रिभुवन फर्त्याल और अनिल रजबार भी बीच-बीच में चेहरा दिखाते रहे. गिरिजा पांडे, प्रदीप पांडे और हरीश पंत भी आते-जाते रहे. गढ़वाल से आए मदन मोहन चमोली अपने फकीरी ठाठ में दिखे. और भी ढेर सारे जाने-पहचाने चेहरे मौजूद थे. पिछले अस्कोट-आराकोट अभियान के अमेरिकी साथी डेन डेंटजन और फ्रांस की पेंटर और फिल्ममेकर कैथरीन से भी मिलकर अच्छा लगा. फेस्टिवल की रीढ़ और फिल्म मेकर संजय जोशी हर वक़्त सही स्क्रीनिंग की व्यवस्था करने में जुटे नज़र आए.

दोनों दिन पूरी गहमा-गहमी रही. फेस्टिवल की ज़्यादातर फिल्में पहले से देखी हुई थीं. इसलिए मैं कभी फिल्म देखता रहा तो कभी हॉल के बाहर दोस्तों से बात करता रहा. वहां चार्ली चैप्लिन की मॉडर्न टाइम्स, वित्तोरियो दे सिका की बाइसिकल थीव्स, माजिद मजीदी की चिल्ड्रन ऑफ़ हैवन और एमएस सथ्यू की गर्म हवा जैसी फिल्में दिखाई गईं. इनके अलावा नेत्र सिंह रावत की माघ मेला और एनएस थापा की एवरेस्ट भी दिखाई गई. प्रतिरोध के सिनेमा का ये पहला फेस्टिवल भी इन्हीं को समर्पित था. इनके अलावा और भी कई डॉक्यूमेंटरीज वहां दिखाई गईं. हैरत की बात ये थी कि फेस्टिवल के दौरान वहां लगातार ख़ुफिया विभाग वाले अड्डा ज़माए रहे. पता चला कि पहले दिन दैनिक जागरण ने छापा था कि फेस्टिवल की आड़ में नैनीताल में नक्सली जुटने जा रहे हैं. इसलिए इंटैलीजेंस वालों के वीडियो कैमरों की नज़र हम पर लगातार लगी रही.
फेस्टिवल फिल्मों के अलावा भी बहुत कुछ था. वहां अवस्थी मास्साब के बनाए पोस्टरों के डॉक्यूमेंटेशन को देखना एक अद्बुत अनुभव था. मास्साब अब दुनिया में नहीं है. वो अपने हाथों से जनआंदोलनों के पक्ष में और सामाजिक विरूपताओं पर चोट करने वाले पोस्टर बनाते थे और उन्हें गले में आगे-पीछे लटका कर शहर में घूमते थे. नैनीताल के लोग इस अद्भुत व्यक्तित्व को कभी भुला नहीं पाएंगे. जब नैनीताल में था तो ज़हूर दा के इंतख़ाब में उनसे अक्सर मुलाक़ात होती थी. विनीता यशस्वी ने उनके पोस्टरों को सहेज कर बहुत बड़ा काम किया है. इस मौक़े पर बीरेन डंगवाल के कविता संग्रह स्याही ताल और दिवाकर भट्ट के संपादन में निकलने वाली पत्रिका आधारशिला के त्रिलोचन विशेषांक का भी विमोचन हुआ.
फेस्टिवल का सबसे यादगार और महत्वपूर्ण अनुभव रहा भारतीय चित्रकला पर अशोक भौमिक का प्रभावशाली व्याख्यान. सालों से सोचता रहा हूं कि जिसकी पेंटिंग्स जितनी महंगी बिकती हैं वो उतना बड़ा कलाकार कैसे मान लिया जाता है. अशोक दा की बातों में मुझे इस सवाल का जवाब मिल गया. उन्होंने रज़ा, सूजा और हुसैन के मुक़ाबले चित्त प्रसाद, जैनुअल आबीदीन और सोमनाथ होड़ की जनपक्षधर कला से रू-ब-रू कराया. थैंक्यू अशोक दा! फिल्म फेस्टिवल के दौरान ही शहर में सरकारी शरदोत्सव भी चल रहा था. वहां दिखाए जा रहे बाज़ारू कार्यक्रमों की वजह से ज़्यादातर साथी नाराज़ दिखे.
नैनीताल में शाम होते-होते पड़ने वाली हाड़ कंपा देने वाली ठंड का भी अपना ही एडवेंचर था. कुंडल ने ठंड भगाने की कुछ व्यवस्था तो की लेकिन सबकी ठंड दूर कर पाना इतना आसान नहीं था. इसलिए शायद बाहर से आए कुछ साथी निराश भी हुए. रात हमने अभिनेता इदरीश मलिक के होटल में बिताई. आजकल वो पारिवारिक वजहों से शहर में ही रहते हैं. फेस्टिवल के दौरान उनसे मुलाक़ात हो चुकी थी. हां, टीवी कलाकार हेमंत पांडे से भी मिला था. मैंने हैलो किया तो भाई की नज़र हवा में टिक गई. मैं समझ नहीं पाया कि मुझे सचमुछ नहीं पहचाना गया या बात कुछ और थी.
इतनी जल्दी शहर छोड़ने की इच्छा बिल्कुल भी नहीं थी लेकिन जल्दी लौटने की मज़बूरी थी. सुबह साढ़े पांच बजे जागकर हमने होटल छोड़ दिया. सुबह मैं और भारत वॉक करते हुए मल्लीताल से तल्लीताल पहुंचे. नैना देवी के मंदिर में घंटियां बज रही थीं, मैंने घंटियों की आवाज़ की तरफ़ ध्यान दिलाया तो उसने जोड़ा कि इससे पहले आरती और अजान भी सुनाई दे रहे थे. न जाने क्यों नास्तिक होने के बाद भी मुझे आरती और अजान में एक अद्भुत क़िस्म के संगीत का अहसास होता है. वो मेरे लिए म्यूजिक विद्आउट लिरिक जैसा कुछ है. पौ फट चुकी थी. धीरे-धीरे अंधेरा छंट रहा था. तल्लीताल कोर्ट के आसपास के भवन चांदी की तरह चमक रहे थे. ठंडी सड़क की तरफ़ अब भी अंधेरा था. झील में रोशनियों के प्रतिबिम्ब धीरे-धीरे तैरते हुए ख़त्म हो रहे थे. अंग्रेजों के बनाए गोथिक स्टाइल के आर्किटेक्चर में नैनीताल बहुत ख़ूबसूरत लग रहा था.
वो नौ नवंबर का दिन था. यानी उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस. तल्लीताल पहुंचने पर देखा कि उमा भट्ट की अगुवाई में महिला मंच की कार्यकर्ता बसों में भरकर गैरसैंण जा रही थीं. राज्य बनने के नौ साल बीत जाने के बाद भी लोग पहाड़ में राजधानी पाने के लिए लड़ रहे थे. सत्ताधारियों को जनता की ये मांग बेवकूफी लगती है. पहाड़ मुझे वहीं नज़र आया. जहां मैंने सालों पहले छोड़ा था. आंदोलन अब भी जारी हैं और प्रतिरोध की कलाएं उनके साथ खड़ी हैं. नैनीताल के लौटते वक़्त बस की अगली सीट पर बैठे मैंने देखा कि कहीं दूर नेपाल की पहाड़ियों में उग रहे लाल सूरज की किरणें यात्रियों की आंखों को चुंधिया रही थीं. हर मोड पर ये रोशनी और ज़्यादा तेज़ महसूस हो रही थी. ताज्जुब की बात ये कि मैंने आज तक पहाड़ी सफ़र में कभी इस तरह का सूरज नहीं देखा था. बस पटवाडांगर, ज्योलीकोट होते हुए आगे बढ़ रही थी. पतझड़ पीछे छूट चुका था. चारों तरफ़ हरे-भरे पेड़ थे. भावर की ढलान के बाद आगे मैदान शुरू होने थे. फिर एक दूसरे भूगोल में आना था.
-- भूपेन. ’कबाड़खाना’ से साभार.
Thursday, November 12, 2009
नैनीताल का पहला फ़िल्म उत्सव
7-8 नवम्बर 2009 को नैनीताल में पहले फिल्म उत्सव का आयोजन किया गया। नैनीताल में यह अपनी तरह का पहला आयोजन था जिसे एन.एस. थापा और नेत्र सिंह रावत को समर्पित किया गया था। इस फिल्म उत्सव का नाम रखा गया था `प्रतिरोध का सिनेमा´। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को उन संघषों से रु-ब-रु करवाना था जो कि कमर्शियल फिल्मों के चलते आम जन तक नहीं पहुंच पाती हैं। युगमंच नैनीताल एवं जन संस्कृति मंच के सहयोग से इस फिल्म उत्सव का आयोजन किया गया।
आयोजन का उद्घाटन युगमंच व जसम के कलाकारों द्वारा कार्यक्रम प्रस्तुत करके की गयी। इसी सत्र में फिल्म समारोह स्मारिका का विमोचन भी किया गया और प्रणय कृष्ण, गिरीश तिवाड़ी `गिर्दा´ एवं इस आयोजन के समन्वयक संजय जोशी ने सभा को संबोधित किया। इसके बाद आयोजन की पहली फिल्म एम.एस. सथ्यू निर्देशित `गरम हवा´ दिखायी गयी। बंटवारे पर आधारित यह फिल्म दर्शकों द्वारा काफी सराही गयी
सायंकालीन सत्र में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि वीरेन डंगवाल के काव्य संग्रह `स्याही ताल´ का विमोचन किया गया तथा गिरीश तिवाड़ी `गिर्दा´ और विश्वम्भर नाथ सखा को सम्मानित किया गया। इस दौरान `आधारशिला´ पत्रिका का भी विमोचन किया गया। इसके बाद राजीव कुमार निर्देशित 15 मिनट की डॉक्यूमेंट्री `आखिरी आसमान´ का प्रदर्शन किया गया जो कि बंटवारे के दर्द को बयां करती है। उसके बाद अजय भारद्वाज की जे.एन.यू. छात्रसंघ के अध्यक्ष चन्द्रशेखर पर केन्द्रत फिल्म `1 मिनट का मौन´ तथा चार्ली चैिप्लन की फिल्म `मॉर्डन टाइम्स´ दिखायी गयी। इस फिल्म के साथ पहले दिन के कार्यक्रम समाप्त हो गये।
दूसरे दिन के कार्यक्रमों की शुरूआत सुबह 9.30 बजे बच्चों के सत्र से हुई। इस दौरान `हिप-हिप हुर्रे´, `ओपन अ डोर´ और `चिल्ड्रन ऑफ हैवन´ जैसी बेहतरीन फिल्में दिखायी गयी। बाल सत्र के दौरान बच्चों की काफी संख्या मौजूद रही और बच्चों ने इन फिल्मों का खूब मजा लिया।
दोपहर के सत्र की शुरूआत में नेत्र सिंह रावत निर्देशित फिल्म `माघ मेला´ से हुई और इसके बाद एन.एस. थापा द्वारा निर्देशित डॉक्यूमेंट्री फिल्म `एवरेस्ट´ का प्रदर्शन किया गया। यह फिल्म 1964 में भारतीय दल द्वारा पहली बार एवरेस्ट को फतह करने पर बनायी गयी है। यह पहली बार ही हुआ था कि एक ही दल के सात सदस्यों ने एवरेस्ट को फतह करने में कामयाबी हासिल की थी। निर्देशक एन.एस. थापा स्वयं भी इस दल के सदस्य थे। इस फिल्म को दर्शकों से काफी प्रशंसा मिली। इस के बाद विनोद राजा निर्देशित डॉक्यूमेंट्री `महुवा मेमोआर्ज´ का प्रदर्शन किया गया। यह फिल्म 2002-06 तक उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झारखंड और आंध्र प्रदेश के आदिवासी इलाकों में किये जा रहे खनन पर आधारित है जिसके कारण वहां के आदिवासियों को अपनी पुरखों की जमीनों को छोड़ने के लिये मजबूर किया जा रहा है। यह फिल्म आदिवासियों के दर्द को दर्शकों तक पहुंचाने में पूरी तरह कामयाब रही।
सायंकालीन सत्र में अशोक भौमिक द्वारा समकालीन भारतीय चित्रकला पर व्याख्यान दिया गया और एक स्लाइड शो भी दिखाया गया तथा कवि विरेन डंगवाल जी का सम्मान किया गया। इस उत्सव की अंतिम फिल्म थी विट्टोरियो डी सिल्वा निर्देशित इतालवी फिल्म `बाइसकिल थीफ´। उत्सव का समापन भी युगमंच और जसम के कलाकारों की प्रस्तुति के साथ ही हुआ।
समारोह के दौरान अवस्थी मास्साब के पोस्टरों और चित्तप्रसाद के रेखाचित्रों की प्रदर्शनी भी लगायी गयी जिसे काफी सराहना मिली।
विनीता यशस्वी के ब्लॉग "यशस्वी" से साभार
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