Sunday, December 26, 2010

बिनायक सेन के लिए एक कविता

बिनायक सेन को सजा देने के कोर्ट के निर्णय के बाद दुनियाभर में उनके समर्थन में विभिन्न तरह की अभिव्यक्तियाँ हो रहीं हैं । पेश है बंगलुरु में रह रहे इलाहाबादी मृत्युंजय की ताजा कविता ....


बीर बिनायक


बीर बिनायक बांके दोस्त !
थको नहीं हम संग तुम्हारे
झेल दुखों को जनता के संग
कान्धा भिड़ता रहे हमेशा
यही भरोसा यही भरोसा
बज्र कठिन कमकर का सीना
मज्जा मांस और रकत पसीना
मिलकर चलो जेल से बोलें
जिनकी काटी गयीं जुबानें
उनके मुंह के ताले खोलें

साथी देखो यही राज है
यही काज है
लोकतंत्र का पूर्ण नाश है
लोकसभा और राज सभा
की नूतन अभिनव बक्क वास है
देखो इनके लेखे पूरा
देश एक मैदाने घास है

देशभक्ति का दंगल देखो
रमन सिंह के छत्तीसगढ़ में
चिदंबरम के राज काज में
वेदांता के रामराज में
उगा हुआ है जंगल देखो
नियमगिरी क़ी नरम खाल से
नोच रहे हैं अभरक देखो

देखो बड़ा नमूना देखो
कैसे लगता चूना देखो
भ्रष्ट ज़ज्ज़ और भ्रष्ट कलेक्टर
सबकुछ अन्दर सबकुछ अन्दर
चूस रहे हैं बीच बाज़ार
नंगे नंगे बीच सड़क पर
खुल्लम खुल्ला खोल खालकर
नाच रहे हैं
देशभक्ति का प्रहसन देखो
टेंसन देखो
अनशन देखो

राडिया वाला टेप देख लो
बरखा जी और बीर सांघवी
नई नवेली खेप देख लो
देखो मिस्टर मनमोहन को
जे पी सी अभिनन्दन देखो
ही ही ही ही दांत चियारे
देखो मिस्टर देशभक्त जी
कौन जगह अब पैसा डारें
घूम रहे हैं मारे मारे
कलमाडी क़ी काली हांडी
देखो
अडवाणी क़ी मूंछ देखो
येदुरप्पा क़ी पूँछ देखो
रेड्डी क़ी करतूत देखो
लोकतंत्र के पूत देखो
भूत देखो

पैसा देखो
भैंसा देखो
ऐसा देखो
वैसा देखो
लाइन से सब देशभक्त हैं
इससे पूरा देश त्रस्त है
देखो

नक्सल देखो
डी जी पी के कुशल दांत में लगा हुआ है बक्कल देखो
सलवा जुडूम बनाने वाले
रक्त काण्ड रचवाने वाले
जल जंगल जमीन के भीतर
महानाश रचवाने वाले
देखो नए दलाल देखो
टमाटरी हैं गाल देखो
पी एम सी एम हाउस भीतर
कोर्ट के भीतर कोर्ट के बाहर
हंडिया भीतर
काली काली दाल देखो
देखो रोज़ कमाल देखो

जान बचाने वाले
लाज रखाने वाले
लड़ भिड जाने वाले
सत्य बोलने वाले
देखो
नए नए है देश दुरोहित
नयी नयी परिभाषा देखो
शासन क़ी अभिलाषा देखो
भाषा देखो
जेल देखो
सेल देखो
खनिज लादकर छत्तीसगढ़ से जाने वाली रेल देखो
जनता के अधिकार देखो
ह्त्या का व्यापार देखो

घी में सनी अंगुलियाँ देखो
हीरे क़ी झिन्गुलिया देखो
बड़े चोर का घाव देखो
विपक्षी का ताव देखो
लगे फिटकरी जियें गडकरी
चेहरा देखो संग मरमरी
कांग्रेस के मंतर देखो
बन्दर देखो
अभी अभी बिल से निकला है जनपथ पर छछुन्दर देखो
माल देखो
ताल देखो
डेमोक्रेसी क़ी टटकी टटकी उतरी है यह खाल देखो

ज़ज्ज़ के घर में नेता बैठा नेता घर अखबार
प्रजातंत्र का विकसित होता नव नव कारोबार
बीर बिनायक तुम जैसों से ही बाकी है देश
भिड़ बैठेंगे आयें जितने बदल-बदल कर भेष

मृत्युंजय

2 comments:

Tahiba said...

sahi likha hai comrade aapne!hume apna virodh vayakht karna chahiye jitna ho sake chahe woh kavita ke maadyam se ho naaro se aur apni ladai jaari rakhni hai.

नितिन नाम है said...

Bahut badhiya bhai!!!
thoda sa muktibodh aur thoda sa nagarjun yaad aa rahe hain...
NITIN